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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 521 of 590

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Page 521

अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहितं ४९१


मूलाज्ञानस्याऽविषयो जड एवाऽथवाऽन्यथा ।
चक्षुषा सौरभं भायाद् वृत्तिव्यक्ताचिदन्वयात् ॥ २९ ॥

अथवा मूलाज्ञानका ही जड़ विषय नहीं होता है, अवस्थाऽज्ञानका तो तत्तत् जड़ ही विषय होता है, यदि ऐसा न माना जाय, तो चक्षुसे चन्दनखण्डवृत्ति सौगन्ध्यका भी प्रत्यक्ष होने लगेगा, क्योंकि चन्दनाकार वृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यका उसमें भी अन्वय है ॥ २९ ॥

अथवा मूलाज्ञानस्यैव जडं न विषयः । अवस्थाऽज्ञानानां त्ववच्छिन्नचैतन्याश्रितानां तत्तज्जडमेव विषयः । अन्यथा चाक्षुषवृत्त्या चन्दनखण्डचैतन्याभिव्यक्तौ तत्संसर्गिणो गन्धस्याप्यापरोक्ष्यापत्तेः । तदनभिव्यक्तौ चन्दनतद्रूपयोरप्यप्रकाशापत्तेः । न च चाक्षुषवृत्त्या चन्दनतद्रूपावच्छिन्नचैतन्योरभिव्यक्त्या तयोः प्रकाशः, गन्धाकारवृत्त्यभावेन गन्धावच्छिन्नचैतन्यस्यानभिव्यक्त्या तस्याप्रकाशश्चेति वाच्यम्, चैतन्यस्य

अथवा ‡ मूलाज्ञानका ही जड़ विषय नहीं होता है । अवच्छिन्नचैतन्यमें आश्रित अवस्थारूप अज्ञानोंके तो तत्-तत् जड़ पदार्थ ही विषय होते हैं । यदि जड़ अनावृत माना जाय, तो चक्षुरिन्द्रियजन्य वृत्तिसे चन्दनखण्डावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर चन्दनखण्डके साथ सम्बन्ध रखनेवाले गन्धका भी अपरोक्ष अनुभव हो जायगा । यदि चन्दनखण्डावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न मानी जाय, तो चन्दन और चन्दनके रूपका भी प्रकाश नहीं होगा । यदि शङ्का की जाय कि चाक्षुषवृत्तिसे चन्दन और उसके रूपसे अवच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे उनका प्रकाश होता है, और गन्धाकार वृत्तिके न होनेसे गन्धावच्छिन्न


‡ जड़मात्रविषयक वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यके आवारक अज्ञानका विनाश कैसे होता है, क्योंकि वे भिन्नविषयक हैं, इस प्रकारकी शङ्काके होनेपर अवस्थारूप अज्ञान अवच्छिन्न चैतन्यके आवरण द्वारा जड़को भी आवृत्त करता है, अतः जड़मात्रविषयक वृत्ति भी अवस्थारूप अज्ञानको निवृत्ति कर सकती है, ऐसा समाधान किया गया है। अब उक्त शङ्काका प्रकारान्तरसे भी 'अथवा' इत्यादि ग्रन्थसे समाधान करते हैं, इस पक्षमें जितने जड़ पदार्थ हैं, वे सबके सब मूलाज्ञानके विषय नहीं हैं, तथापि अवस्थारूप अज्ञानके विषय हैं, क्योंकि 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' इस प्रकार भी प्रतीति होती है, यदि जड़ अवस्थारूप अज्ञानका विषय न माना जाय, तो चन्दनके टुकड़ेके आकारमें परिणत चाक्षुषवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यसे चन्दनमें रहनेवाले गन्धका भी प्रकाश होने लगेगा, अतः तत्-तत् जड़ पदार्थोंको अवश्य अवस्थारूप अज्ञानोंसे आवृत्त मानना चाहिए, इसीसे 'जड़ अज्ञानका विषय नहीं होता' इस सिद्धान्तके साथ विरोध भी नहीं है, क्योंकि यह सिद्धान्त मूलाज्ञानमात्रविषयक है, यह भाव है।