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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 513 of 590

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Page 513

ब्रह्मज्ञानके शाब्दापरोक्षत्वका विचार ] भाषानुवादसहितं ४८३


उत्पद्यत इति तस्याऽज्ञाननिवर्तकत्वमज्ञाननिवृत्तौ तन्मूलभेदप्रविलयादा-*परोक्ष्यं चेत्युपपद्यतेतराम् ।

नन्वध्ययनकालेऽपि शब्दात् स्यादपरोक्षधीः ।
सत्ताधृतिर्विचाराच्चेन्मननादिश्रमो वृथा ॥ २५ ॥
मैवं पुन्दोषशान्त्यर्थं मननादेर्विधानतः ।
तत्तत्संसृष्टवृत्त्येत्थं तदज्ञाननिवर्हणम् ॥ २६ ॥

यदि शङ्का हो कि अध्ययनकालमें भी वेदान्तशब्दसे अपरोक्ष ज्ञानके होनेसे विचार व्यर्थ है, यदि कहें कि ब्रह्मसत्ताके निश्चयात्मक ज्ञानके लिए उसकी आवश्यकता है, तो मनन आदिकी निरर्थकता होगी, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि पुरुषदोषकी निवृत्ति करनेके लिए मनन आदिका विधान होनेसे तत्-तत् अर्थोंसे संसृष्ट वृत्तिसे तत्तद्विषयक अज्ञानकी निवृत्ति होती है ॥ २५ ॥ २६ ॥

नन्वेवमध्ययनगृहीतवेदान्तजन्येनापि तज्ज्ञानेन मूलाज्ञाननिवृत्त्यापरोक्ष्यं किं न स्यात् । न च तत्सत्तानिश्चयरूपत्वाभावाद् नाज्ञान-निवर्तकमिति वाच्यम्, तथाऽपि कृतश्रवणस्य निर्विचिकित्सशाब्दज्ञानेन तन्निवृत्त्या मननादिवैयर्थ्यापत्तिरिति चेद्, न; सत्यपि श्रवणाद् निर्विचिकित्सज्ञाने चित्तविक्षेपदोषेण प्रतिबन्धाद् अज्ञानानिवृत्त्या तन्निराकरणे होता है, इसलिए उसमें अज्ञानकी निवर्तकता है और अज्ञानकी निवृत्तिहोनेसे तन्मूलक भेदका विनाश होनेसे अपरोक्षत्वकी भी उपपत्ति हो सकती है ।

यदि शङ्का हो कि ऐसा होनेपर अध्ययनसे सम्पादित वेदान्तसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानसे भी मूलभूत अज्ञानकी निवृत्ति होनेसे अपरोक्षत्व क्यों नहीं होता ? यदि कहो कि विचारके पूर्व अध्ययनगृहीत वेदान्तजन्य ज्ञान सत्तानिश्चयात्मक नहीं है, अतः अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि निवर्तक ज्ञानमें सत्तानिश्चयरूपत्व विशेषण देनेपर भी कृतश्रवण पुरुषको सत्तानिश्चयात्मक शाब्दज्ञान होनेसे उसीसे अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, फिर मनन आदि निरर्थक प्रसक्त होंगे, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि श्रवणसे सत्तानिश्चयात्मक ज्ञानके होनेपर भी चित्तके विक्षेपात्मक दोषसे प्रतिबन्ध होनेके कारण अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, अतः उसके (अज्ञानके) निराकरण


* अर्थात् जो ज्ञान नियमतः विषयसंसृष्टरूपसे उत्पन्न हो, वही ज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसे नियमका अङ्गीकार करनेसे, यह भाव है ।