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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 512 of 590

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Page 512
४८२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

घटापरोक्ष्यानुभवानुपपत्तिरपि । नन्वेवं वृत्तिविषयचैतन्याभेदाभिव्यक्ति-
लक्षणस्याऽपरोक्ष्यस्य स्वविषयचैतन्यगताज्ञाननिवृत्तिप्रयोज्यत्वे तस्याज्ञा-
ननिवृत्तिप्रयोजकत्वायोगाद् ज्ञानमात्रमज्ञाननिवर्तकं भवेदिति चेद्, न;
'यद् ज्ञानमुत्पद्यमानं स्वकारणमहिम्ना विषयसंसृष्टमेवोत्पद्यते, तदेवा-
ज्ञाननिवर्तकम्' इति विशेपणाद्, ऐन्द्रियकज्ञानानां तथात्वात् । एवं
च शब्दादुत्पद्यमानमपि ब्रह्मज्ञानं सर्वोपादानभूतस्वविषयब्रह्मसंसृष्टमेव

है, इसलिए चैत्रको घटके अपरोक्षत्वका अनुभव भी नहीं होता है । ❊यदि
शङ्का हो कि ऐसा माननेपर अर्थात् वृत्त्यवच्छिन्न और विषयावच्छिन्न चैतन्यके
अभेदकी अभिव्यक्तिरूप अपरोक्षत्वके अपने विषयमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिसे
प्रयोज्य होनेपर उसमें अज्ञाननिवृत्तिकी प्रयोजकताका अभाव होनेसे ज्ञानमात्र
ही अज्ञानका निवर्तक प्रसक्त होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो
उत्पद्यमान ज्ञान अपने कारणकी सामर्थ्यसे विषयसंसृष्ट ही उत्पन्न होता है,
वही अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसा विशेषण होनेसे इन्द्रियजन्य ज्ञान ही
अज्ञानके निवर्तक होते हैं, सब ज्ञान नहीं । इसी प्रकार शब्दसे उत्पद्यमान
ब्रह्मज्ञान भी सबके प्रति उपादानभूत अपने विषयरूप ब्रह्मसे संसृष्ट ही उत्पन्न


घटावारक अज्ञान मैत्रके प्रति ही स्वाश्रयभूत घटचैतन्यप्रतियोगिक भेदका आपादक होगा,
मैत्रका अज्ञान चैत्रके प्रति घटावच्छिन्न चैतन्यका अनावारक है, तथापि चैत्रके प्रति स्वाश्रय-
भूत घटावच्छिन्न चैतन्यप्रतियोगिक भेदका आपादक नहीं है, इस अवस्था में चैत्रके घटज्ञानसे
चैत्रके अज्ञानकी निवृत्ति होनेसे तत्कृत भेदकी निवृत्ति होनेपर भी चैत्र और घटावच्छिन्न
चैतन्यका परस्पर मैत्राज्ञानकृत भेद होनेसे अभेदकी अभिव्यक्ति नहीं है, अतः चैत्रको घटके
अपरोक्षत्वका अनुभव अनुपपन्न ही होगा, इससे मैत्रका अज्ञान मैत्रके प्रति जैसे स्वाश्रय चैतन्यका
भेदापादक है, वैसे चैत्रके प्रति स्वाश्रयचैतन्यप्रतियोगिक भेदका आपादक नहीं है,
क्योंकि चैत्रके प्रति स्वाश्रय चैतन्यका आवारक नहीं है, ऐसा कहना होगा, इसलिए उक्त
व्यवस्थाकी सिद्धि होगी ।

* तात्पर्य यह है कि 'अपरोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है' इस प्रकारसे ज्ञानके अज्ञान-
निवर्तकत्वमें अपरोक्षत्वको प्रयोजक नहीं मान सकते हैं, क्योंकि ज्ञानगत अपरोक्षत्व अज्ञानकी
निवृत्तिके अधीन है, यदि कहो कि ज्ञानगत अपरोक्षत्व अज्ञाननिवृत्तिका प्रयोजक नहीं है, तो
यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे ज्ञानमात्रमें अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसक्ति होनेसे
परोक्षज्ञानमें भी अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसक्ति होगी, इस अभिप्रायसे इस ग्रन्थसे शङ्का
करते हैं ।

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