सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| ३८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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चेतने निष्कृष्टे एवोपाधिवशाद् भेदकल्पनाऽस्तु । अकल्पिताश्रयभेद एव व्यवस्थाप्रयोजक इति क्वाप्यसम्प्रतिपत्तेः । मणिमुकुरकृपाणाद्युपाधिकल्पितेन भेदेन मुखे श्यामावदातवर्तुलदीर्घभावादिधर्माणा मङ्गुल्युपष्टम्भोपाधिकल्पितेन भेदेन दीपे पाश्चात्त्यपौरस्त्यादिधर्माणां च व्यवस्थासम्प्रतिपत्तेरित्याहुः ॥ ११ ॥
क उपाधिरिह—
प्रकृतमें उपाधि कौन है ?
एवमुपाधिवशाद् व्यवस्थोपपादने सम्भाविते जीवानां परस्परसुखाद्यननुसन्धानप्रयोजक उपाधिः क इति निरूपणीयम् ।
आहुर्भोगायतनभिन्नताम् ।
भोगायतन ( भोगाश्रय ) शरीर आदिका भेद ही उपाधि है, ऐसा कोई लोग कहते हैं ॥
चेतनमें ही उपाधिसे भेदकी कल्पना रहे । अकल्पित आश्रयका भेद ही व्यवस्थाका प्रयोजक (कारण) है, ऐसा कहींपर भी अद्यावधि निश्चित नहीं है, क्योंकि मुखमें मणि, मुकुर ( दर्पण ), कृपाण ( तलवार ) आदि उपाधिके कल्पित भेदसे श्यामत्व, अवदातत्व (स्वच्छत्व), वर्तुलत्व, दीर्घत्व आदि धर्मोंकी और दीपमें अङ्गुलि आदि उपाधिके अवलम्बनसे परिकल्पित भेदसे ‡ पाश्चात्य, पौरस्त्य आदि धर्मोंकी व्यवस्था देखी जाती है ॥११॥
उक्त प्रकारकी उपाधिके आधारपर भले ही व्यवस्थाका उपपादन हो, परन्तु जीवोंके सुख आदिका परस्पर अनुसन्धान ❄ और अननुसन्धानकी प्रयोजक उपाधि कौन है ? इसका निरूपण अवश्य करना चाहिए ।
‡ अर्थात् दीपके आगे अङ्गुली रख देनेसे सामने अन्धकार हो जाता है, इससे कुछ ऊपर अङ्गुलीसे आड़ कर देनेसे कुछ ऊपरके हिस्सेमें अन्धकार हो जाता है, और निम्न देशमें प्रकाश होता है ।
❄ अर्थात् देवदत्त अपने सुखका आप ही अनुभव करता है, यज्ञदत्तके सुखका अनुभव नहीं करता है, इसी प्रकार एक ही देवदत्त चरणमें दुःखका अनुभव करता है, हस्तमें नहीं करता है, इसमें अवश्य कोई प्रयोजक उपाधि होनी चाहिए, अन्यथा किसी एकके प्रति अनुभव और किसी एकके प्रति अननुभवकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, अतः उस उपाधिके निर्वचनके लिए यह प्रश्न किया गया है, यह भाव है ।