सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextजीवोपाधिभेद-विचार] भाषांनुवादसहित ३८७
व्यवस्था न युज्यते इति वाच्यम्, मूलाग्ररूपोपाधिभेदमात्रेण वृक्षे संयोगतदभावव्यवस्थादर्शनात् । तत्तत्पुरुषकर्णपुटोपाधिभेदेन श्रोत्रभावमुपगतस्याऽऽकाशस्य तत्र-तत्र शब्दोपलम्भकत्वानुपलम्भकत्वतारमन्द्रेष्टानिष्ट-शब्दोपलम्भकत्वादिवैचित्र्यदर्शनाच्चेत्याहुः ।
एके त्वनाश्रितोपाधिभेदभेदप्रकल्पनम् ।
प्रतिबिम्बेष्विवोपाधिधर्माध्यासव्यवस्थितिः ॥ ६३ ॥
अनाश्रित उपाधिभेद भेदका कल्पक है, और प्रतिबिम्बोंमें उपाधिधर्मोंकी व्यवस्थाके समान प्रकृतमें भी व्यवस्था हो जाती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥६३॥
एके तु यद्याश्रयभेदादेव विरुद्धधर्मव्यवस्थोपपादननियमः, तदा
भी युक्त नहीं है, क्योंकि मूल और अग्ररूप उपाधिके भेदसे ही एक वृक्षमें संयोग और संयोगाभावकी व्यवस्था देखी जाती है*। और इसी प्रकार तत्-तत् पुरुषोंके कर्णपुटरूप उपाधिके भेदसे श्रोत्रेेन्द्रियत्वको† प्राप्त हुए आकाशमें तत्-तत् स्थलमें शब्दके उपलम्भकत्व और अनुपलम्भकत्व तथा तार, मन्द्र, इष्ट और अनिष्ट शब्दके उपलम्भकत्व आदि वैचित्र्य देखे जाते हैं ।
कुछ लोग तो कहते हैं कि यदि आश्रयके भेदसे ही विरुद्ध धर्मोंकी व्यवस्था उपपादित होती है, यह नियम है, तो अन्तःकरणसे उपहित निष्कृष्ट
* तात्पर्य यह है कि संयोग और संयोगाभाव अव्याप्यवृत्ति है अर्थात् अपने अभावाधिकरणमें भी उनकी स्थिति रहती है, वृक्षमें संयोग भी है और उसका अभाव भी है, परन्तु उनमें अवच्छेदक अलग अलग हैं, संयोगके अवस्थानमें शाखा अवच्छेदक है और संयोगाभावके अवस्थानमें मूल अवच्छेदक है, इसी रीतिसे उपाधिके (अवच्छेदकके) भेदसे एक आत्मामें सुखित्व और दुःखित्वकी व्यवस्था हो सकती है ।
† कर्णपुटसे—कर्णविवरसे अवच्छिन्न आकाश ही श्रोत्र-इन्द्रिय है, अन्य आकाश श्रोत्रेेन्द्रिय नहीं है, इसीलिए श्रोत्र पदार्थके निर्वचनमें 'कर्णविवरावच्छिन्नाकाशः श्रोत्रम्' ऐसा कहा गया है ।
तार शब्द—नाद विशेषका वाची है, इस विषयमें सङ्गीतरत्नाकरमें इस प्रकारका विवरण मिलता है—
नादोऽतिसूक्ष्मः सूक्ष्मश्च... ... ...
नकारं प्राणनामानं दकारमनलं विदुः ।
जातः प्राणाग्निसंयोगत्तेन नादोऽभिधीयते ॥६॥
व्यवहारे त्वसौ त्रेधा हृदि मन्द्रोऽभिधीयते ।
कण्ठे मध्यो मूर्ध्नि तारो द्विगुणश्चोत्तरोत्तरः ॥७॥
[ संगीतरत्नाकर स्वराध्याय प्रकरण तृतीय ]