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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 41 of 590

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Page 41

विधिविचार ] भाषानुवादसहित १३


भाष्येऽपि 'सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत्' ( ३-४-४७ ) इत्यधिकरणे 'विद्यासहकारिणो मौनस्य बाल्यपाण्डित्यवद्विधिरेवाऽऽश्रयितव्यः, अपूर्वत्वाद्' इति—पाण्डित्यशब्दशन्दिते श्रवणे अपूर्वविधिरेवाऽङ्गीकृत इति ।

सामान्य कार्यकारणभावमें व्यभिचार दोष है, अतः लाघव अप्रयोजक है अर्थात् लाघवके रहनेपर भी व्यभिचारके भयसे सामान्य नियम नहीं मान सकते । प्रत्युत गान्धर्वशास्त्रश्रवणका और षड्ज आदि साक्षात्कारका परस्पर कार्यकारणभाव है, क्योंकि उन्हींका अन्वय और व्यतिरेक देखनेमें आता है, यह भाव है, और इस विषयमें भाष्यकारकी सम्मति भी देते हैं—'भाष्येऽपि' इत्यादिसे ] ।

भाष्यमें भी 'सहकार्यन्तरविधिः'* इस अधिकरणमें 'विद्याके सहकारी कारण निदिध्यासनकी भी बाल्य और पाण्डित्यके समान विधि ही माननी चाहिए, क्योंकि बाल्य और पाण्डित्यके समान निदिध्यासन भी अपूर्व है अर्थात् विद्याके साधनरूपसे अन्य प्रमाणसे प्राप्त नहीं है' इस प्रकार पाण्डित्य कहलानेवाले श्रवणमें अपूर्वविधिको ही अङ्गीकार किया गया है ।


* इस अधिकरणमें भाष्यका अभिप्राय यह है—बृहदारण्यक उपनिषद्में इस प्रकारकी श्रुति है कि 'तस्मात् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् बाल्यञ्च पाण्डित्यं च निर्विद्य थ मुनिः'—चूँकि भूतकालीन ब्राह्मणोंने श्रवण आदि साधनोंसे आत्माका साक्षात्कार करके सम्पूर्ण विक्षेपोंसे रहित जीवन्मुक्तिका व्यञ्जक परमहंसाश्रम प्राप्त किया था, इससे ब्रह्मसाक्षात्कारके अभिलाषी आधुनिक ब्राह्मण भी पाण्डित्य प्राप्त करके बालभावसे रहनेकी इच्छा करें और बाल्य और पाण्डित्यका सम्पादन करके मुनि—ध्यानशील हों । पण्डाशब्दका अर्थ है—विचार करनेके लिए उपयुक्त साधारण बुद्धि, वह जिस पुरुषको प्राप्त है, वह पण्डितशब्दसे कहा जाता है । उस पण्डितका कार्य पाण्डित्य कहा जाता है । और छोटे बच्चेका जो कृत्य—दम्भ आदिका अभाव है, वह बाल्य कहलाता है, यद्यपि यथेष्ट चेष्टा करना भी बालभाव है, तथापि विद्यामें उपयुक्त न होनेसे उसका यहाँ ग्रहण नहीं करना चाहिए । इसी प्रकार मुनिशब्दका अर्थ—ध्यान है, क्योंकि व्यास प्रभृति ध्याननिष्ठोंमें ही मुनिशब्दका प्रयोग देखा जाता है । और ध्यानके बिना विचार मात्रसे शान्ति रखनेवाले पुरुषमें मुनिशब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता । इस परिस्थितिमें जैसे अपूर्व होनेसे श्रवण विधि माना जाता है, वैसे ही विद्याकी उत्पत्तिमें सहकारी कारण मौनकी भी विधि माननी चाहिए, यह भाव है । सूत्रका अर्थ है—तद्वतः—श्रवण और मननके प्रभावसे जिसको तत्त्वनिर्णयरूप विद्या प्राप्त हुई है, ऐसे तत्त्वसाक्षात्कारकी अभिलाषा करनेवाले संन्यासीके लिए पाण्डित्य और बाल्यकी अपेक्षासे तीसरे मौनका-ध्यानका भी विधान किया जाता है । यहाँ-

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