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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 40 of 590

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Page 40
१२सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ प्रथम परिच्छेदं

श्रोतव्यार्थसाक्षात्कारहेतुः' इति शास्त्रान्तरश्रवणे गृहीतः सामान्यनियमोऽस्ति । येनाऽत्र विशिष्य हेतुत्वग्राहकाभावेऽपि सामान्यमुखेनैव हेतुत्वं प्राप्यत इत्याशङ्क्येत । गान्धर्वादिशास्त्रश्रवणस्य षड्जादिसाक्षात्कारहेतुत्वाभ्युपगमेऽपि कर्मकाण्डादिश्रवणात् तदर्थधर्मादिसाक्षात्कारादर्शनेन व्यभिचारात् । तस्मादपूर्वविधिरेवाऽयम् ।

विचारमें हेतुता प्राप्त ही है, तो 'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि नहीं हो सकती है*, इस शङ्काका 'न वा' इत्यादिसे परिहार करते हैं ] और श्रोतव्यरूप अर्थके साक्षात्कारके प्रति श्रवणमात्र कारण है, इस प्रकारका सामान्य नियम भी गान्धर्व आदि अन्य शास्त्रके श्रवणमें गृहीत नहीं है, जिससे कि इस स्थलमें विशेषरूपसे हेतुताका ग्रहण करानेवाले प्रमाणके न रहनेपर भी सामान्यरूपसे [ वेदान्तश्रवणमें आत्मसाक्षात्कारकी ] हेतुता प्राप्त होगी, इस प्रकारकी आशङ्का की जाय, क्योंकि षड्ज आदि साक्षात्कारके प्रति गान्धर्व आदि शास्त्रके श्रवणको हेतुरूपसे स्वीकार करनेपर भी कर्मकाण्ड आदि शास्त्रके श्रवणसे उसके धर्म आदि अदृष्ट अर्थका साक्षात्कार नहीं देखा जाता, इसलिए पूर्वकथित सामान्य नियममें व्यभिचार है । इससे 'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि ही है । [ यद्यपि पूर्वमें सामान्य नियमके विषयमें लाघव बतलाया गया है तो भी धर्मके श्रवणस्थलमें अदृष्ट रूपधर्म अथवा अलौकिक स्वर्गके साधनत्वसे विशिष्ट याग आदि धर्मका, प्रत्यक्षके अयोग्य होनेसे, साक्षात्कार नहीं देखा जाता ] इससे पूर्वोक्त


* षड्जादि सात प्रकारके स्वरोंका संगीतशास्त्रमें वर्णन मिलता है—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद । इसकी उत्पत्ति श्रुतियोंसे मानी गई है । इस विषयमें संगीतरत्नाकरमें यों कहा गया है—
श्रुतिभ्यः स्युः स्वराः षड्जर्षभगान्धारमध्यमाः ।
पञ्चमो धैवतश्चाथ निषाद इति सप्त ते ॥
षड्जशब्दका लक्षण भी संगीतरत्नाकरके टीकाकारने बतलाया है—
षण्णां स्वराणां जनकः षड्भिर्वा जन्यते स्वरैः ।
षड्भ्यो वा जायतेऽङ्गेभ्यः षड्ज इत्यभिधीयते ॥
इसका अर्थ—इतर छः स्वरोंका कारण, छः स्वरोंसे प्रकाशित होनेवाला अथवा कण्ठ आदि छः स्थानोंसे उत्पन्न होनेवाला स्वर षड्ज कहलाता है । इसी प्रकार ऋषभ आदिके भी लक्षण संगीतरत्नाकरमें [ पृ० ३९ आनन्दाश्रम पूना, संस्करण ] बतलाये गये हैं ।

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