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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 404 of 590

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Page 404
३७४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

र्थक्रियाकारित्वसम्भवान्मिथ्यैव प्रपञ्चः, न सत्य इति ॥८।

ननु मिथ्यात्वसत्यत्वे ब्रह्मैक्यश्रुतिपीडनम् ।
तन्मिथ्यात्वे तु विश्वस्य सत्यत्वं केन वार्यते ॥५५॥

शङ्का होती है कि मिथ्यात्वको सत्य माननेसे ब्रह्मैक्यश्रुति बाधित होगी, उसके मिथ्या होनेपर भी विश्वकी सत्यता का निराकरण होगा ॥ ५५ ॥

ननु मिथ्यात्वस्य प्रपञ्चधर्मस्य सत्यत्वे ब्रह्माद्वैतक्षतेस्तदपि मिथ्यैव वक्तव्यमिति कुतः प्रपञ्चस्य सत्यत्वक्षतिः ? मिथ्याभूतं ब्रह्मणः सप्रपञ्चत्वं न निष्प्रपञ्चत्वविरोधीति त्वदुक्तरीत्या मिथ्याभूतमिथ्यात्वस्य सत्यत्वाविरोधात् ॥

सत्यमत्रोक्तमद्वैतदीपिकायां विरोधिनीम् ।
स्वधर्म्यन्यूनसत्ताकं मिथ्यात्वं सत्यतां हरेत् ॥५६॥

इस प्रश्नके समाधानमें अद्वैतदीपिकामें कहा है कि अपने धर्मीकी अन्यून सत्ता-वाला मिथ्यात्व अपने से विरुद्ध सत्यत्वका अपहरण करता है ॥ ५६ ॥

अत्रोक्तमद्वैतदीपिकायाम्—वियदादिप्रपञ्चसमानस्वभावं मिथ्यात्वम् ।


होनेपर भी अर्थक्रियाकारिताका सम्भव होनेसे प्रपञ्च मिथ्या ही है, सत्य नहीं है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ८ ॥

अब शङ्का होती है कि प्रपञ्चमें रहनेवाला मिथ्यात्व यदि सत्य है, तो अद्वैत ब्रह्मकी क्षति होगी अर्थात् अद्वितीय ब्रह्म सिद्ध नहीं होगा, इसलिए सिद्धान्तीको उसे भी मिथ्या ही कहना होगा। इस परिस्थितिमें प्रपञ्चकी सत्यताका निरास कैसे होगा ? क्योंकि ब्रह्मका मिथ्याभूत प्रपञ्चतादात्म्य ꕤ प्रपञ्चशून्यताका विरोधी नहीं है, इस प्रकारके तुम्हारे ही कथनके अनुसार मिथ्याभूत मिथ्यात्व सत्यत्वका विरोधी नहीं हो सकता है।

इस † आक्षेपके समाधानमें अद्वैतदीपिकामें कहा है कि मिथ्यात्वका


ꕤ प्रपञ्चतादात्म्य ही सप्रपञ्चत्व है और निष्प्रपञ्चत्व प्रपञ्चात्यन्ताभावरूप है, इस प्रकारका निष्प्रपञ्चत्व वास्तविक है, क्योंकि, व्यावहारिक प्रपञ्चका अत्यन्ताभाव ब्रह्ममें पारमार्थिक माना गया है, इससे एक ब्रह्ममें सप्रपञ्चत्व और निष्प्रपञ्चत्वका विरोध नहीं है, वैसे ही मिथ्यात्व और सत्यत्वका विरोध नहीं है।

† मिथ्यात्वधर्म मिथ्याभूत ही है, इस पक्षका ग्रहण करके समाधान करते हैं—आकाश

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