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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 403 of 590

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Page 403

मिथ्या पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भाषानुवादसहित ३७३

क्वचिदधिष्ठानसामान्यज्ञानोपरमेण केवलाध्यासनाशात्, क्वचित् गुञ्जापुञ्जादौ चक्षुषा वह्न्याद्यध्यासस्थले दाहपाकादिप्रयोजकस्योष्णस्पर्शादेरनध्यासाच्च तत्र तत्राऽर्थक्रियाभावोपपत्तेः। क्वचित् कासांचिदर्थक्रियाणामिष्यमाणत्वाच्च। मरीचिकोदकादिव्यावर्तकस्याऽर्थक्रियोपयोगिरूपस्य वक्तव्यत्वे च श्रुतिविरुद्धं प्रत्यक्षादिना दुर्ग्रहं त्रिकालाबाध्यत्वं विहाय दोषविशेषाजन्य रजतत्वादेरेव रजताद्युचितार्थक्रियोपयोगिरूपस्य वक्तुं शक्यत्वाच्च। तस्मान्मिथ्यात्वेऽप्य-


हुआ है, कहींपर अधिष्ठानके सामान्यांशज्ञानके उपरत होनेसे केवल अध्यास-का नाश हुआ है * और किसी स्थलमें गुञ्जा-पुञ्ज आदिमें चक्षुसे वह्नि आदिके अध्यासस्थलमें दाह, पाक अर्थक्रियाके हेतुभूत उष्णस्पर्श आदि अध्यस्त नहीं होते हैं। और किसी स्थलविशेषमें कुछ अर्थक्रियाओंका अङ्गीकार भी करते हैं †। मरीचिकाजल आदिमें न रहनेवाले अर्थात् केवल व्यावहारिक पदार्थोंमें रहनेवाले अर्थक्रियामें उपयुक्त धर्मका यदि निर्वचन करता है, तो मिथ्यात्वश्रुतिसे विरुद्ध तथा प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे ग्रहण न होनेवाले त्रिकालाबाध्यत्वरूप सत्यत्वको छोड़कर ‡ दोषविशेषसे अजन्य रजतादिवृत्ति रजतत्व आदि रजतादिकी उपयुक्त अर्थक्रियाके प्रति कारणतावच्छेद धर्म है, ऐसा कह सकते हैं। इससे अर्थोंके मिथ्या


अनन्तर उसे ज्ञात होता है कि यह जल नहीं है, किन्तु केवल मरीचिका है, इस प्रकार विशेषदर्शनसे अपने उपादान अज्ञानके साथ जलाध्यास निवृत्त होता है, अतः इससे अर्थ-क्रियाकी प्रसक्ति नहीं होती है, यह भाव है।

* जिस शुक्तिरजतादि स्थलमें विशेषदर्शन नहीं हुआ हो, उस स्थलमें अधिष्ठान-सामान्यज्ञानरूप कारणका नाश होनेसे ही उक्त स्थलमें अर्थक्रियाकारिता नहीं है, यह भाव है।

† 'स्वप्नवदिति ब्रूमः' इस ग्रन्थसे स्वप्नमें जिन पदार्थोंकी अर्थक्रियाकारिता मानी गई है, उन पदार्थोंकी अर्थक्रियाकारिता इष्ट है, यह भाव है।

‡ तात्पर्य यह है कि अर्थक्रियाके प्रति कारणतावच्छेदक सत्यत्व है, ऐसा पूर्वमें कहा गया है, परन्तु उसे नहीं मान सकते हैं, क्योंकि सद्भूतरजतसे कटक आदि कार्य होते हैं, और तद्भिन्न शुक्तिरजतसे नहीं होते हैं, इस प्रकारके अन्वय और व्यतिरेकसे सहकृत प्रत्यक्षसे ही अर्थक्रियाकारितावच्छेदकरूपसे सत्त्वका परिज्ञान तुम्हें करना होगा, परन्तु यह सत्त्व मिथ्यात्वका विरोधी कालत्रयाबाध्यत्वरूप नहीं हो सकता है, क्योंकि उसका प्रत्यक्षसे ग्रहण नहीं हो सकता है, अतः उससे पृथक् ही कहना होगा।