सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
Page 387 of 590
Read in context[सृष्टिकल्पक-विचार] भाषानुवादसहित ३५७
विशेषप्रसङ्गात् । न द्वितीयः, अविद्याया अपि कल्पनीयत्वेन तत्कल्पनात्प्रागेव कल्पकसिद्धेर्वक्तव्यत्वात् ।
अत्राहुः पूर्वसंकॢप्तमोहयुक्तोऽन्यकल्पकः ॥
उक्त शङ्काके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि पूर्व-पूर्व कल्पित अविद्यासे युक्त आत्मा ही उत्तर उत्तर अविद्याका कल्पक है ।
अत्र केचिदाहुः—पूर्वपूर्वकल्पिताविद्योपहित उत्तरोत्तराविद्याकल्पकः । अनिदंप्रथमत्वाच्च कल्पककल्पनाप्रवाहस्य नानवस्थादोषः । न चाऽविद्याया अनादित्वोपगमाच्छुक्तिरजतवत् कल्पितत्वं न युज्यते, अन्यथा साद्यनादिविभागानुपपत्तेरिति वाच्यम्, यथा स्वप्ने कल्प्यमानं गोपुरादि किञ्चित्
संसारका कल्पक है, यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि अविद्या भी कल्पित ही है, इससे उस अविद्याकी कल्पनासे पहले ही कल्पक अविद्योपहित आत्माका अस्तित्व मानना होगा, [ परन्तु वह तो है नहीं, अतः अविद्याकी सृष्टि हो ही नहीं सकेगी ] ।
इस आक्षेपके परिहारमें कोई लोग कहते हैं कि पूर्व-पूर्व कल्पित अविद्यासे उपहित आत्मा ही उत्तर-उत्तर अविद्याका कल्पक है । यह अविद्या प्रथम कल्पित है यह बात नहीं होगी, इससे कल्पक और कल्पनाके प्रवाहमें अनवस्था दोष नहीं है, [ क्योंकि प्रपञ्चकल्पकत्वरूपसे श्रुतिसिद्ध अविद्योपहित आत्मा पूर्व-पूर्व अविद्याके बिना प्रपञ्चका कल्पक ही नहीं हो सकता है] । यदि यह शङ्का हो कि अविद्याका अनादिरूपसे स्वीकार किया गया है, इसलिए शुक्ति-रजतके समान उसको कल्पित नहीं मान सकते हैं, यदि हठात् उसे कल्पित मानोगे तो सादि * और अनादिका जो विभाग किया गया है, वह असङ्गत होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे स्वप्नमें कल्प्यमान किसी गोपुर आदिकी—
* 'जीव ईशो विशुद्धा चित्तथा जीवेशयोर्भिदा ।
अविद्या तच्चितोर्योगः षडस्माकमनादयः ॥'
जीव, ईश्वर, विशुद्ध ब्रह्म, जीव और ईश्वरका भेद, अविद्या, अविद्या और चैतन्यका सम्बन्ध, ये छः पदार्थ वेदान्तमतमें अनादि हैं और अन्य सादि हैं, यह श्लोकका अर्थ है, यदि अविद्या कल्पित मानी जाय, तो इस श्लोकसे अनादि और सादिका जो विभाग किया गया है, वह विरुद्ध होगा, यह भाव है ।