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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 386 of 590

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Page 386
३५६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

दृष्टिसृष्टिवादिनस्तु कल्पितस्याऽज्ञातसत्त्वमनुपपन्नमिति कृत्स्नस्य जाग्रत्प्रपञ्चस्य दृष्टिसमसमयां सृष्टिमुपेत्य घटादिदृष्टेश्चक्षुःसन्निकर्षानुविधान-प्रतीतिं दृष्टेः पूर्वं घटाद्यभावेनासङ्गच्छमानां स्वप्नवदेवं समर्थयमानाः जाग्रद्गजाद्यनुभवोऽपि न चाक्षुष इत्याहुः ॥

निरुपाधिरथाऽन्यो वा कल्पकः प्रथमे भवेत् ॥
मुक्तस्य संसृतिः को वा द्वितीये मोहकल्पकः ॥४१॥

प्रपञ्चका कल्पक निरुपाधिक आत्मा है अथवा सोपाधिक आत्मा है ? प्रथम पक्षमें मुक्त पुरुषको संसारप्राप्ति होगी और द्वितीय पक्षमें अज्ञानका कल्पक कौन होगा॥४१॥

ननु दृष्टिसृष्टिमवलम्ब्य कृत्स्नस्य जाग्रत्प्रपञ्चस्य कल्पितत्वोपगमे कस्तस्य कल्पकः—निरुपाधिरात्मा वा, अविद्योपहितो वा ? नाद्यः, मोक्षेऽपि साधनान्तरनिरपेक्षस्य कल्पकस्य सत्त्वेन प्रपञ्चानुवृत्त्या संसारा-


* दृष्टिसृष्टिवादियोंका कहना है कि जो पदार्थ कल्पित है, उसकी अज्ञातसत्ता हो ही नहीं सकती है, अतः सम्पूर्ण जाग्रत्प्रपञ्चकी दृष्टि-समकालीन सृष्टि मानकर घटादिदृष्टिमें चक्षुके सन्निकर्षका अनुविधानप्रत्यय दृष्टिके पूर्वमें घटादिका अभाव होनेसे नहीं हो सकता है, अतः स्वप्नके समान जाग्रत् कालीन घट आदिका अनुभव भी चाक्षुष नहीं है ॥६॥

अब शङ्का होती है कि यदि दृष्टिसृष्टिका अवलम्बन करके सम्पूर्ण प्रपञ्च कल्पित माना जाय, तो उसकी कल्पना करनेवाला कौन है ? अविद्यारूप उपाधिसे रहित आत्मा है अथवा अविद्यारूप उपाधिसे उपहित आत्मा है ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि मोक्षमें भी, अन्य साधनोंकी अपेक्षा न करनेवाले निरुपाधिक कल्पक आत्माकी अवस्थिति होनेके कारण, प्रपञ्चकी अनुवृत्ति होगी, इससे मोक्ष और संसारमें कोई अन्तर नहीं रह जायगा। अविद्यासे उपहित आत्मा


* अनेक पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, ऐसे शुद्धसत्त्व पुरुष स्वप्नप्रपञ्चसे जाग्रत्प्रपञ्चमें कुछ भी विलक्षणता नहीं देखते हैं, उन ब्रह्मविद्याभिलाषियोंका लक्ष्य करके स्वप्न और जाग्रत् अवस्था में समस्त संसारकी उत्पत्ति और लयका प्रतिपाद करनेवाली श्रुतिका अनुसरण करके दृष्टिसृष्टिवादका पूर्वाचार्योंने निरूपण किया है, इसी वादका अवलम्बन करके प्रसङ्गवश जाग्रत्पदार्थोंमें भी चाक्षुषत्वानुभवको भ्रान्त बतलाते हैं, यह भाव है।

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