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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 38 of 590

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Page 38
१०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

तत्रोपायापरिज्ञानादलौकिकसमीक्षणे ॥
प्रकटार्थकृतः प्राहुर्पूर्वं श्रवणे विधिम् ॥ ४ ॥

प्रकटार्थकार कहते हैं कि ब्रह्मसाक्षात्कारमें श्रवणरूप उपायका किसी प्रमाणसे परिज्ञान न होनेके कारण उक्त तीन विधियोंमें से श्रवणमें अपूर्वविधि है ॥ ४ ॥

अत्र प्रकटार्थकारादयः केचिदाहुः—अपूर्वविधिरयम् , अप्राप्तत्वात् । नहि 'वेदान्तश्रवणं ब्रह्मसाक्षात्कारहेतुः' इत्यत्र अन्वयव्यतिरेकप्रमाण-

इसपर प्रकटार्थकार आदि कहते हैं—'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि है, क्योंकि वेदान्तश्रवण अप्राप्त है, अर्थात् वेदान्तश्रवण ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण है, यह 'श्रोतव्यः' इस विधिको छोड़कर अन्य किसी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणसे नहीं जाना जाता । [ परन्तु वेदान्तश्रवणमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता अन्य प्रमाणसे प्राप्त नहीं है, यह कहना युक्त नहीं है, क्योंकि वक्ष्यमाण अन्वय और व्यतिरेकरूप* प्रमाणसे वेदान्तश्रवणमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता प्राप्त है इसपर 'नहि' इत्यादिसे कहते हैं ] वेदान्तका श्रवण ब्रह्मसाक्षात्कारका कारण है, इस कार्यकारणभावमें अन्वय या व्यतिरेक-


* कार्य और कारणके अवधारणमें अर्थात् यह इसका कारण है और यह इसका कार्य है, इस प्रकारके कार्यकारणभावका निश्चय करनेमें अन्वय और व्यतिरेककी आवश्यकता होती है । अन्वयके लिए बहुत जगहोंमें अन्वयसहचार और अन्वयव्याप्तिका भी प्रयोग देखा जाता है, इसी तरह व्यतिरेकके लिए व्यतिरेकव्याप्ति और व्यतिरेकसहचारका प्रयोग भी देख पड़ता है । इसलिए कहींपर ऐसे शब्द आवें, तो घबराना नहीं चाहिए । कारणके रहनेपर कार्यका अवश्य रहना अन्वय है, जैसे—दण्डके रहनेपर घटका रहना । कारणके अभावमें कार्यका अभाव होना व्यतिरेक है; जैसे—दण्डरूप कारणके अभावमें घटरूप कार्यका अभाव होना अर्थात् दण्डके बिना घट कदापि उत्पन्न नहीं हो सकता । अतः इस प्रकारके अन्वय और व्यतिरेकके होनेसे दण्डमें घटकारणत्वका निश्चय होता है । यदि अन्वय और व्यतिरेक न हों, तो किसी भी वस्तुमें कारणत्वका निश्चय नहीं होगा । अन्वय और व्यतिरेकका अभाव होनेपर यदि वस्तुमें कारणत्व माना जाय, तो अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेक-व्यभिचार दोष प्राप्त होते हैं। अन्वयव्यभिचारका अर्थ है—अन्वय न होना अर्थात् कारणके रहनेपर भी कार्योत्पत्ति न होना और व्यतिरेकव्यभिचार—व्यतिरेकव्याप्तिका न रहना अर्थात् कारणके अभावमें भी कार्यकी उत्पत्ति होना । वे दोनों—अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेक-व्यभिचार दोष क्रमशः अन्यथासिद्धत्वज्ञानद्वारा और साक्षात् प्रतियोगित्वज्ञानद्वारा कारणत्व-ज्ञानमें प्रतिबन्धक होते हैं। भाव यह है कि पहला अन्वयव्यभिचार परम्परासे कारणत्वका विरोधी है और दूसरा व्यतिरेकव्यभिचार साक्षात् कारणत्वका विरोधी है, क्योंकि कारण उसे कहते हैं जो अनन्यथासिद्ध होकर पूर्वक्षणमें कार्यके अधिकरणमें रहे, इसलिए