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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 37 of 590

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Page 37

विधिविचार ] भाषानुवादसहित ९


इति शङ्क्यम्, विधितोऽवहनननियमं विना आक्षेपलभ्यस्य नखविदल-
नादेर्निवर्तयितुमशक्यतया अप्राप्तांशपरिपूरणरूपस्य नियमस्य प्राथम्यात्
विधेयावहननगतत्वेन प्रत्यासन्नतयाच तस्यैव नियमविधिफलत्वोपगमात् ।
तदनुनिष्पादिन्या अविधेयगतत्वेन विप्रकृष्टाया इतरनिवृत्तेः सन्निकृष्टफल-
सम्भवे फलत्वानौचित्यात् ।
एवं विविक्तासु तिसृषु विधेर्विधासु किंविधः श्रवणविधिरश्रीयते ।


प्रयोजनका भी लाभ होनेसे फलतः नियमविधि और परिसंख्याविधिमें कोई
भेद नहीं है ? [ फलतः कहनेसे नियम और परिसंख्यामें स्वरूपतः भेद है,
यह मालूम होता है, क्योंकि नियमविधि पक्षमें प्राप्त अवघातक्रियाका विधान
करती है और परिसंख्याविधि नित्य प्राप्त क्रियाका विधान करती है, इसलिए
स्वरूपतः भेद होनेपर भी फलतः भेद नहीं है, यह शङ्का हो सकती है] परन्तु
ऐसी शङ्का करना युक्त नहीं है, क्योंकि विधिसे जब तक अवघातका नियम न
किया जाय, तब तक तण्डुलनिष्पत्तिसे होनेवाले आक्षेपसे प्राप्त नखविदलन आदिकी
निवृत्ति नहीं की जा सकती, इससे अप्राप्तांशका परिपूरणरूप नियम ही प्रथम
उपस्थित है, और साक्षात् विधिसे लभ्य अवघातमें ही ( अप्राप्तांशकी पूर्ति
होनेसे ) अप्राप्तांशपरिपूरणरूप नियम ही विधिके प्रति प्रत्यासन्न — निकटवर्ती
है, इसलिए अप्राप्तांशपरिपूरणरूप नियमको ही नियमविधिका फल मानना
चाहिए, इतरनिवृत्ति नियमविधिका फल नहीं है, क्योंकि इतरनिवृत्ति अप्राप्तांश-
परिपूरणकी उपस्थितिके अनन्तर उपस्थित होती है और अविधेय जो
नखविदलन है, उसमें रहनेके कारण निकटवर्ती नहीं है, इसलिए सन्निकृष्ट
वस्तुमें जब तक फलत्वका सम्भव हो, तब तक असन्निकृष्टमें ( नखविदलन
आदिकी निवृत्तिमें ) फलत्वकी कल्पना करना उचित नहीं है ?

पूर्वोक्त तीन प्रकारकी विधियोंमें से श्रवणविधि कौन विधि है ? [ग्रन्थके
इतने अंशसे अपूर्व, नियम और परिसंख्या विधिका निरूपण किया गया, परन्तु
'श्रोतव्यः' यह श्रवणविधि अपूर्वविधि है या नियमविधि है अथवा परिसंख्या
विधि है, इसका विचार नहीं हुआ, इसलिए पूर्वपक्षी पूछता है कि 'श्रोतव्यः'
यह श्रवणविधि किस विधिके अन्तर्गत है अर्थात् उसको अपूर्वविधि मानना
चाहिए या नियमविधि मानना चाहिए अथवा परिसंख्याविधि मानना चाहिए ? ]

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