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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 357 of 590

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Page 357

प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३२७


एतेनोपाधिप्रतिहतनयनरश्मीनां बिम्बप्राप्त्यनुपगमे व्यवहितस्योद्भूतरूपादिरहितस्य च चाक्षुषप्रतिबिम्बभ्रमप्रसङ्ग इति निरस्तम्।

किं च तदुपगमे एव उक्तदूषणप्रसङ्गः। कथम् ? साक्षात् सूर्यावलोकन इव विना चक्षुर्विक्षेपमवनतमौलिना निरीक्ष्यमाणे सलिले ततः प्रतिहतानां नयनरश्मीनामूर्ध्वमुत्प्लुत्य बिम्बसूर्यग्राहकत्ववत् तिर्यक्चक्षुर्विक्षेपं विना ऋजुचक्षुषा दर्पणे विलोक्यमाने तत्प्रतिहतानां पार्श्वस्थमुखग्राहकत्ववच्च वदनसाचीकरणाभावेऽप्युपाधिप्रतिहतानां पृष्ठभागव्यवहितग्राहकत्वं


इससे अर्थात् बिम्बगत अव्यवहितत्व, स्थूलत्व और उद्भूतरूपत्व आदिकी प्रतिबिम्बध्यासके प्रति हेतुता होनेसे—उपाधिसे आहत नयनरश्मियोंका बिम्बके प्रति गमन न माना जाय, तो व्यवहित या उद्भूतरूप आदिसे रहित वस्तुका चाक्षुष प्रतिबिम्बाध्यास प्रसक्त होगा—इस आपत्तिका भी निरास हुआ ही समझना चाहिए।

किञ्च, आहत रश्मियोंका बिम्बके प्रति गमन माननेमें ही व्यवहितका प्रतिबिम्ब प्रसक्त होगा। कैसे होगा ? इस प्रकार होगा—जैसे साक्षात् गगनस्थ सूर्यमण्डलको देखनेके लिए चक्षुका विक्षेप (चक्षुको सूर्यकी ओर करना) आवश्यक है, परन्तु उसके बिना अधोमुखसे निरीक्ष्यमाण जलमें उससे (जलसे) प्रतिहत नयनकी किरणें ऊपर जाकर बिम्बका ग्रहण करती हैं, और जैसे [पार्श्वस्थ (समीपस्थ) पुरुषको ग्रहण करनेके लिए चक्षुके तिरछेपनकी आवश्यकता होती है] तिरछे देखे बिना सीधे नेत्रोंसे देखे जाते हुए दर्पणमें उससे (दर्पणसे) प्रतिहत नेत्ररश्मियाँ पार्श्वस्थ मुखको ग्रहण करती हैं, वैसे ही वदनके साचीकरणके * बिना भी दर्पण आदि उपाधिसे प्रतिहत रश्मियोंसे पृष्ठभागसे व्यवहित पदार्थोंका भी ग्रहण होना


प्रकृतमें प्रतिबिम्बाध्यासमें कुड्यादिव्यवहित मुखादि साक्षात्प्रतिबन्धक माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, अन्यथा प्रतिबिम्बकी उत्पत्तिमें बिम्बसन्निकर्षको कारण न माननेके कारण व्यवहित वस्तुका भी प्रसङ्ग आ सकता है, अतः दिवाल आदिसे व्यवहित मुखादिमें प्रतिबिम्बोत्पत्तिकी प्रतिबन्धकता माननी चाहिए, यह भाव है।

* चक्षुसे पृष्ठभागसे व्यवहित पदार्थका ग्रहण करनेमें उपयुक्त मुखका व्यापार अर्थात् पीछेके पदार्थको देखनेमें मुखको जो उसकी ओर घूमाना पड़ता है, इसी व्यापार की प्रकृतमें साचीकरणशब्दसे विवक्षा की गई है, यह भाव है।