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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 356 of 590

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Page 356
३२६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

प्रतिमुखाध्यासपक्षे तु न किञ्चिद् दृष्टविरुद्धं कल्पनीयम् ।

तथा हि—अन्यवहितस्थूलोद्भूतरूपस्यैव चाक्षुषाध्यासदर्शनाद् बिम्बगतस्थौल्योद्भूतरूपयोः स्वाश्रयसाक्षात्कारकारणत्वेन क्लृप्तयोः स्वाश्रयप्रतिबिम्बाध्यासेऽपि कारणत्वम्, कुड्याद्यावरणद्रव्यस्य त्वगिन्द्रियादिन्यायेन प्राप्यकारितयाऽवगतनयनसन्निकर्षविघटनद्वारा व्यवहितवस्तुसाक्षात्कारप्रतिबन्धकत्वेन क्लृप्तस्य व्यवहितप्रतिबिम्बाध्यासेऽपि विनैव द्वारान्तरं प्रतिबन्धकत्वं च कल्पनीयम् । तत्र को विरोधः क्वचित् कारणत्वादिना क्लृप्तस्य फलवलादन्यत्रापि कारणत्वादिकल्पने ।

जिस पक्षमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद न मानकर अनिर्वचनीय प्रतिबिम्बाध्यासकी ही उत्पत्ति मानी जाती है, उस पक्षमें किसी भी व्यवहार-विरुद्ध कारण या प्रतिबन्धककी कल्पना नहीं की जाती है ।

किसी प्रकारके व्यवधानसे रहित स्थूल और उद्भूत रूपवान्‌का ही चाक्षुष अध्यास लोकमें देखा जाता है, इससे बिम्बमें रहनेवाले स्थूलत्व और उद्भूतरूप, जो अपने आधारके प्रत्यक्षमें * कारणतारूपसे विनिश्चित हैं, वे आश्रयके प्रतिबिम्बाध्यासमें भी कारण हैं, ऐसी कल्पना कर सकते हैं । दिवाल आदि जितने आवारक द्रव्य हैं, वे—त्वगिन्द्रियके समान † प्राप्यकारित्वरूपसे निश्चित नेत्रके सन्निकर्षके विघटन द्वारा ही व्यवहित वस्तुके साक्षात्कारमें प्रतिबन्धक क्लृप्त हैं, अतः व्यवहितके प्रतिबिम्बाध्यासमें भी किसी द्वारविशेषकी अपेक्षा न करके ही वे प्रतिबन्धक हैं, ऐसी कल्पना की जाती है । कहींपर कारणत्व आदि रूपसे निश्चित वस्तुमें फलके बलसे यदि अन्यत्र भी कारणत्व आदिकी कल्पना की जाय, तो उसमें क्या विरोध है, अर्थात् कुछ भी विरोध नहीं है, यह भाव है ।


* अर्थात् महत्त्व और उद्भूतरूप इन दोनोंमें उनके आश्रयीभूत द्रव्यविषयक चाक्षुष-प्रत्यक्षमात्रके प्रति कारणता है। यह घटादि प्रत्यक्ष स्थलमें देखा गया है, अतः क्लृप्त है ।

† जैसे त्वगिन्द्रय विषयदेशको प्राप्त होकर ही उस विषयका ग्रहण करती है, वैसे ही चक्षुरिन्द्रिय भी विषयदेश को प्राप्त करके ही विषयका ग्रहण करती है, अतः उसको प्राप्यकारी कहा जाता है। अतः पूर्वमें—दिवाल आदिमें साक्षात्कार प्रतिबन्धकत्व माननेसे सन्निकर्षमात्रका विलोप प्रसङ्ग होगा, यह जो कहा था, वह निराकृत हुआ समझना चाहिए, क्योंकि सन्निकर्षमें हेतुत्वग्राहक प्रमाणके अनुरोधसे सन्निकर्षके विघटन द्वारा ही कुड्यादिमें प्रत्यक्षकी प्रतिबन्धकता मानी जाती है,