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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 320 of 590

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Page 320
२९०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

विषयत्वोपगमेन प्रत्यक्षोपपादनं कर्तुं शक्यम्। ब्रह्मातिरिक्तसकलमिथ्यात्व-प्रतिपादकषड्विधतात्पर्यलिङ्गोपपन्नानेकश्रुतिविरुद्धेन एकेनाऽर्थवादेन प्रस्तरे यजमानतादात्म्यस्य तात्त्विकस्य प्रतिपादनासम्भवात्। एवं ‘तत्त्वमसि’ वाक्येन त्वंपदवाच्यस्य सर्वज्ञत्वाभोक्तृत्वकर्तृत्वादिविशिष्टब्रह्मस्वरूपत्वबोधने तत्राऽसर्वज्ञत्वभोक्तृत्वादिप्रत्यक्षमत्यन्तं निरालम्बनं स्यादिति तत्परिहाराय अहङ्कारशवलितस्य भोक्तृत्वादि, ततो निष्कृष्टस्य शुद्धस्य उदासीनब्रह्मस्वरूपत्वम्’ इति व्यवस्थामाश्रित्य भागत्यागलक्षणाऽऽश्रीयते। एवं


भेद क्रमशः—विषय हैं, इस प्रकार मानकर भी प्रत्यक्षका उपपादन कर सकते हैं? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि छः प्रकारके उपक्रम आदि तात्पर्यके बोधक प्रमाणोंसे युक्त, ब्रह्मसे अतिरिक्त समस्त संसारके मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाली अनेक श्रुतियोंके साथ अत्यन्त विरुद्ध एक ✽ अर्थवादवाक्यसे यजमान और प्रस्तरके तात्त्विक अभेदका प्रतिपादन नहीं हो सकता है। इसी प्रकार ‘तत्त्वमसि’ † इत्यादि वाक्यसे ‘त्वंशब्द’ के वाच्य जीवमें सर्वज्ञत्व, अभोक्तृत्व, अकर्तृत्व आदिसे युक्त ब्रह्मरूपताका बोधन करनेमें उस जीवमें असर्वज्ञत्व, भोक्तृत्व आदिका जो प्रत्यक्ष है, वह अत्यन्त निरालम्ब होगा, इसलिए उसके परिहारके लिए अहङ्कारसे उपहित अर्थात् अन्तःकरणसे विशिष्ट चैतन्यमें भोक्तृत्वादि और उससे रहित शुद्धमें उदासीन ब्रह्मस्वरूपता है, इस प्रकारकी


* यदि इस स्थलमें कोई शङ्का करे कि यजमान और प्रस्तरका व्यावहारिक अभेद ही श्रुतिसे बोधित होता है, इससे व्यावहारिक अभेदप्रतिपादक श्रुतिसे बाधित भेदप्रत्यक्ष भी व्यावहारिक भेदविषयक ही होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि समानसत्ताकभेद और अभेद एक जगह नहीं रहते हैं, और श्रुतिसे प्रस्तर और यजमानका प्रातिभासिक अभेद भी बोधित नहीं होता है, क्योंकि शुक्तिमें रजतके अभेदके समान प्रस्तरमें यजमानके अभेदका किसीसे ग्रहण नहीं होता है।

† ‘तत्त्वमसि’ इस वाक्यसे किञ्चिज्ज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त चैतन्यात्मक जीवमें उससे विरुद्ध सर्वज्ञत्वादिसे युक्त चैतन्यात्मक ब्रह्मके साथ सदातन अभेदका प्रतिपादन होता है, इसके अनुरोधस यदि जीवमें सर्वज्ञत्वादि धर्मोंका अङ्गीकार किया जाय, तो असर्वज्ञत्वादिरूप संसारका अवगाही प्रत्यक्ष विरुद्ध होगा, अतः सांसारिक निरवकाश प्रत्यक्षसे श्रुतिका बाध करना चाहिए, और वह बाध विशेष्य चैतन्यांशमात्रका सङ्कोचरूप ही है, ‘यजमानः प्रस्तरः’ इत्यादिके समान सर्वथा मुख्यार्थका त्याग करके गौण अर्थकी कल्पनारूप नहीं है, यह भाव है।

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