सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextप्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार ] भाषानुवादसहित २८९
विषय इति परिकल्प्यते । एवं च प्रस्तरे यजमानभेदग्राहिणो यावद्ब्रह्मज्ञानमर्थक्रियासंवादेनाऽनुवर्तमानस्य प्रत्यक्षस्य प्रातिभासिकविषयत्वाभ्युपगमेनोपपादनायोगाद् 'यजमानः प्रस्तरः' इति श्रुतिबाध्यत्वे सर्वथा निर्विषयत्वं स्यादिति तत्परिहाराय उत्सर्गमपोद्य श्रुतिरेव तत्सिद्ध्यधिकरणादिप्रतिपादितप्रकारेणाऽन्यथानीयते ।
न चाऽद्वैतश्रुतिप्रत्यक्षयोरिव इह श्रुतिप्रत्यक्षयोस्तात्त्विकव्यावहारिक-
रजत और ज्ञानाकार रजत पुरोवर्ती ( सामने ) नहीं हो सकते हैं, इससे इदमर्थसङ्गभिन्नत्वका विरोध होगा यह भाव है, ] विरोधके रहते अन्य प्रमाणोंसे श्रुतिका बाध होना न्याय्य है, इसलिए ब्रह्मज्ञान जब तक न हो तब तक अर्थक्रियामें समर्थ भेदविषयकत्वरूपसे अनुवर्तमान यजमान और प्रस्तरके परस्पर भेदको ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षकी, प्रातिभासिकविषयक मानकर, उपपत्ति नहीं कर सकते हैं, अतः परस्पर अर्थात् कुशमुष्टिमें यजमानका भेद ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षका 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यादि श्रुतिसे बाध किया जायगा, तो सर्वथा ⁜ उक्त प्रत्यक्ष निरवकाश हो जायगा, अतः उक्त प्रत्यक्षमें निरवकाशत्वके परिहारके लिए उक्त सामान्य नियमका बाध करके श्रुतिको ही † 'तत्सिद्धि' अधिकरणमें प्रतिपादित प्रकारसे गौण मानना चाहिए ।
यदि शङ्का हो कि अद्वैतश्रुति और प्रत्यक्षके परस्पर विरोध होनेपर जैसे श्रुतिका विषय अद्वैत पारमार्थिक माना जाता है और प्रत्यक्षका विषय व्यावहारिक द्वैत माना जाता है, वैसे ही प्रकृतस्थलमें भी 'यजमानः प्रस्तरः' इस श्रुतिका और प्रत्यक्षका—यजमान और प्रस्तरका पारमार्थिक अभेद और व्यावहारिक
• प्रस्तरमें ( कुशमुष्टिमें ) यजमानभेदविषयक प्रत्यक्ष प्रातिभासिक भेदविषयक नहीं हो सकता है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानके बिना उसका बाध नहीं होता है, व्यावहारिक भेद भी उसका विषय नहीं हो सकता, क्योंकि उसका खण्डन आगेके ग्रन्थमें ही होनेवाला है। यदि पारमार्थिक भेद माना जाय, तो अद्वैतश्रुतिके साथ विरोध होगा, इसलिए वह निरवकाश होगा, अतः 'यजमानः प्रस्तरः' उसको गौण मानना पड़ता है, यह भाव है।
† तत्सिद्धि अधिकरणका सूत्र है—'तत्सिद्धिजातिसारूप्यप्रशंसाभूमलिङ्गसमवाया इति गुणाश्रयः' [ पू० मी० १।४।२३ ] यद्यपि इतना बड़ा सूत्र एक ही है, परन्तु 'तत्सिद्धिः, जातिः' इत्यादि विभागशः उपलब्धि केवल व्याख्यासौकर्यार्थ ही है, 'परिधिपरिधान' आदि यजमानके कार्यकी कुशमुष्टिसे ( प्रस्तरसे ) सिद्धि होती है, अतः 'यजमान' शब्द गौणीवृत्तिसे प्रस्तरका स्तावक है, यह भाव है।
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