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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 307 of 590

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Page 307

प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित २७७

नैल्यस्याऽभ्रनक्षत्रादेरिव दूरत्वदोषाद् भूसन्निधानावाभास इत्युपपत्तेः । पृथिव्यादिषु सङ्कीर्णतया प्रतीयमानानां गन्धादीनाम्—

‘उपलभ्याऽप्सु चेद्गन्धं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।
पृथिव्यामेव तं विद्यादपो वायुं च संश्रितम् ॥ १ ॥’

इत्यादिभिरागमैरेव व्यवस्थाया वक्तव्यत्वेन प्रत्यक्षादागमप्राबल्यस्य निर्विशङ्कत्वाच्च । नह्याजानसिद्धजलोपष्टम्भादिगतं गन्धादि ‘पृथिवीगुण एव गन्धः, न जलादिगुणः’ इत्यादिरूपेणाऽस्मदादिभिः प्रत्यक्षेण शक्यं विवेचयितुम् । पृथिव्यादीनां प्रायः परस्परसंसृष्टतयाऽन्यधर्मस्याऽन्यत्राऽवभासः सम्भवति इति शङ्कितदोषं प्रत्यक्षम् । अतस्तत्राऽऽगमेन शिक्ष्यत इति चेत्, तर्हि इहाऽपि ब्रह्मप्रपञ्चयोरुपादानोपादेयभावेन परस्परसंसृष्टतयाऽन्यधर्मस्याऽन्यत्राऽवभासः सम्भाव्यते इति शङ्कितदोषं प्रत्यक्षम्—


बादल या नक्षत्र आदिके समान दूरत्वदोषसे पृथिवीकी सन्निधिमें अवभास होता है, इस प्रकार भी उपपत्ति कर सकते हैं ।

और ‘उपलभ्याप्सु०’ (पृथ्वीके समान जल और वायुमें गन्धका ग्रहण करके यदि कोई अपरिपक्वबुद्धि कहे कि ‘जल और वायुमें भी स्वाभाविक गन्ध है’ तो उसका वैसा कहना युक्त नहीं है, किन्तु, जल और वायुमें उपलभ्यमान गन्ध उनके अन्तर्गत पृथिवीका ही है, ऐसा जानना चाहिए ।) इत्यादि आगमप्रमाणोंसे ही पृथ्वी आदिमें संकीर्णरूपसे प्रतीयमान गन्ध आदिकी भी व्यवस्था कह सकते हैं, अतः प्रत्यक्षसे आगमप्रमाणकी बलवत्तरतामें कोई शङ्का नहीं है । स्वभावतः सिद्ध जलोपष्टम्भ पार्थिव द्रव्यमें रहनेवाले गन्ध आदि ‘पृथिवीके ही गुण हैं, जलके गुण नहीं हैं’ इस प्रकार हम लोग प्रत्यक्षसे विवेक नहीं कर सकते हैं, [क्योंकि जलमें भी कहींपर स्वाभाविक गन्ध है, और कहींपर औपाधिक है, ऐसी भी कल्पना हो सकती है] प्रायः पृथ्वी आदिके परस्पर संसृष्ट होनेके कारण अन्य धर्मोंका अन्यमें अवभास होता है, इसलिए प्रत्यक्ष शङ्कितदोषसे कलङ्कित है, इसलिए यदि जलादिमें गन्धके प्रत्यक्षका उक्त शास्त्रसे बाध होता है ? तो प्रकृतमें भी ब्रह्म और प्रपञ्चके परस्पर उपादानोपादेयभाव होनेके कारण अन्योऽन्य तादात्म्यापन्न होकर अन्यके धर्मोंका अन्यत्रमें अवश्य अवभास हो सकता है, इसलिए प्रपञ्चमें सत्यत्वका प्रत्यक्ष भी दोषशङ्कासे कलङ्कित ही है । अतः समान रीतिसे उस प्रत्यक्षकी—