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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 306 of 590

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Page 306
२७६सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ द्वितीय परिच्छेद

नभसः शब्दादिषु पञ्चसु शब्दैकगुणत्वप्रतिपादकागमोपदेशमन्तरेण प्रत्यक्षादिना शक्यमपवदितुम् । न च 'नभसि समीपे नैल्यानुपलम्भाद् दूरे तद्धीर्दूरत्वदोषजन्या' इति निश्चयेन तद्बाधः । दूरे नैल्यदर्शनात् समीपे तदनुपलम्भस्तुहिनावगुण्ठानानुपलम्भवत् सामीप्यदोषजन्य इत्यपि सम्भवात् । अनुभवबलाद् नभोनैल्यमव्याप्यवृत्तीत्युपपत्तेश्च ।

नाऽपि दूरस्थस्य पुंसो यत्र भूसन्निहिते नभःप्रदेशे नैल्यधीः, तत्रैव समीपं गतस्य तस्या नैल्यबुद्धेरभावप्रत्यक्षेण बाधः । उपरिस्थितस्यैव


होता है, उसका—शब्द आदि पाँच गुणोंमें से आकाशमें केवल शब्दगुणाश्रयत्वका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोपदेशके सिवा—प्रत्यक्षसे अपवाद नहीं कर सकते हैं । यदि कहो कि आगमके विना भी आकाशमें नैल्यका बाध होता है, जैसे कि 'आकाशमें समीपसे नैल्यका उपलम्भ न होनेसे दूरमें नैल्यबुद्धि दूरत्व आदि दोषसे जन्य है' इस प्रकारके निश्चयसे नैल्यका बाध होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे वृक्षमें हिमका आवरण दूरसे दिखाई देता है समीपमें नहीं दिखाई देता, क्योंकि समीपमें उसका (हिमावरणका) * सामीप्यदोषसे अनुपलब्भ ही है, वैसे ही आकाशमें दूरसे नैल्यका प्रत्यक्ष होता है और समीपमें प्रत्यक्ष नहीं होता, इसमें मुख्य कारण सामीप्य दोष ही है, अतः आकाशमें नैल्यरूपका अभाव प्रसक्त नहीं होगा, इस प्रकार भी कल्पना कर सकते हैं और अनुभवके आधारपर आकाशके नैल्यको अव्याप्यवृत्ति मानकर भी उक्त उपपत्ति कर सकते हैं ।

और यह भी शङ्का नहीं करनी चाहिए कि अत्यन्त दूर प्रदेशमें खड़े हुए पुरुषको जहाँ पृथ्वीसन्निहित आकाशमें नैल्यबुद्धि होती है, वहींपर यदि पुरुष समीपमें जाय, तो उसको वह नीलबुद्धि नहीं होती है, अतः इसी अभावप्रत्यक्षसे आकाशमें नैल्यका बाध होता है, क्योंकि ऊपरके देशमें अवस्थित नैल्यका ही (मेघ)—


* सामीप्यदोषके अधीन है अवस्थिति जिसकी, ऐसा अनुपलब्भ (ज्ञानका अभाव) यह सामीप्यदोषजन्यका अर्थ करना चाहिए, अन्य अनुपलब्भशब्दका अर्थ है—उपलम्भका प्रागभाव, वह जन्य कैसे हो सकता है । सामीप्यदोषसे उपलम्भके निरुद्ध होनेपर, तो उसके प्रागभावका विनाश न होनेके कारण दोषाधीन स्थिति हो सकती है, अतः असङ्गति नहीं होगी, यह भाव है ।

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