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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 296 of 590

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Page 296
२६६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

न प्रत्यक्षैण ग्रहणं सम्भवति । देशकालव्यवधानेनाऽसन्निकृष्टानापि प्रतियोगिनां सम्भवात् । भेदज्ञानं प्रतियोग्यंशे संस्कारापेक्षणात् स्मृतिरूपमस्तु प्रत्यभिज्ञानमिव तत्तांशे इति चेत्, न ; तथाऽपि भेदगतप्रतियोगिवैशिष्ट्यांशे तदभावात् ।

न च कनकाचलो भेदप्रतियोगी, वस्तुत्वादिति भेदे प्रतियोगिवैशिष्ट्यगोचरानुमित्या तत्संस्कारसम्भवः । भेदे ज्ञानं विनाऽनुमित्यभावेनाऽऽ-


और विपर्यासशून्य भेद प्रकाशित होता है, प्रतियोगीके साथ ही * जिसकी उपलब्धि नियत है, ऐसे भेदका प्रत्यक्षप्रमाणसे अर्थात् चक्षुरादिसे ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि देश और कालके व्यवधानसे असम्बद्ध भी प्रतियोगी हो सकते हैं। यदि कहो कि प्रतियोगी अंशमें भेदका ज्ञान संस्कारकी अपेक्षा रखता है, अतः स्मृतिरूप ही प्रतियोगी अंशमें ज्ञान होगा, जैसे प्रत्यभिज्ञा तत्तांशमें स्मरणात्मक होती है, यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर भी भेदप्रतियोगीके सम्बन्धांशमें स्मृतिरूप ज्ञान नहीं हो सकता है †।

यदि शङ्का हो कि कनकाचल भेदका प्रतियोगी है, वस्तु होनेसे, इस प्रकार की, भेदमें प्रतियोगीके वैशिष्ट्यको विषय करनेवाली, अनुमितिसे भेदगत


* सारांश यह है कि ससम्बन्धिक पदार्थके प्रत्यक्षमें सम्पूर्णसम्बन्धिविषयकत्व और सम्पूर्णसम्बन्धिप्रत्यक्षजन्यत्व, संयोग आदिके प्रत्यक्षमें कॢप्त है, अतः भेदप्रत्यक्षमें भी यावत्प्रतियोगिविषयकत्व और यावत्प्रतियोगिप्रत्यक्षजन्यत्व मानना पड़ेगा, क्योंकि भेदप्रत्यक्ष भी ससम्बन्धिकपदार्थप्रत्यक्ष है, इस परिस्थितिमें संसारभरके सारे प्रतियोगियोंका प्रत्यक्ष न हो सकनेके कारण कॢप्त सामग्रीके न होनेसे भेदप्रत्यक्ष प्रमाणके योग्य नहीं हो सकेगा, इसलिए उसको भ्रान्तिसिद्ध ही मानना पड़ेगा। सिद्धान्तमें भेद-प्रत्यक्षके नित्यसाक्षीरूप होनेसे कारणकी भी अपेक्षा नहीं है।

† वस्तुतस्तु भेदज्ञानमें प्रतियोगितावच्छेदकरूपसे प्रतियोगीके ज्ञानको भेदवादी कारण मानते हैं, और यहाँ प्रतियोगितावच्छेदकरूपसे सम्पूर्ण प्रतियोगियोंका अनुभव नहीं होनेसे संस्कारकी उत्पत्ति नहीं होगी, अतः असन्निकृष्ट पदार्थमें स्मृतिरूपत्वकी उपपत्ति कैसे होगी ? अर्थात् नहीं होगी। यदि कथंचित् मान भी लिया जाय कि स्मरण होता है, तो भी जो कनकाचलका भेद समीपस्थ घटमें अनुभूत होता है, वह नहीं होना चाहिए, क्योंकि कनकाचलका कदापि ग्रहण न होनेके कारण तज्जन्य संस्कार हो ही नहीं सकता। और उसमें स्मृतित्वकी उपपत्ति भी नहीं हो सकती है।