सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextप्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्वविचार ] भाषानुवादसहित २६५
तथा सर्वत्र सन्मात्रस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणम्, तत्रैवेन्द्रियव्यापारः । घटादि-
भेदवस्तुप्रतिभासो भ्रान्त्येत्यभ्युपगमात् ।
ननु तद्वदिह बाधादर्शनात् तथाऽभ्युपगम एव निर्मूल इति चेत्,
न; बाधादर्शनेऽपि देशकालव्यवहितवस्तुवद् घटादिभेदवस्तुनः प्रत्यक्षा-
योग्यत्वस्यैव तत्र मूलत्वात् ।
तथाहि—इन्द्रियव्यापारानन्तरं प्रतीयमानो घटादिः सर्वतो भिन्न
एव प्रतीयते । तदा तत्र घटादिभेदे संशयविपर्ययादर्शनात् । यत्राऽपि
स्थाण्वादौ पुरुषत्वादिसंशयः, तत्राऽपि तद्व्यतिरिक्तेभ्यो भेदोऽसन्दिग्ध-
विपर्यस्तत्वात् प्रकाशते एव । भेदस्य च प्रतियोगिसहोपलम्भनियमवतो
अर्थात् इन्द्रियजन्यवृत्तिसे अभिव्यक्त सन्मात्ररूप साक्षिचैतन्यरूप भ्रान्तिसे
होता है, ऐसा स्वीकार किया गया है ।
यदि कहो कि शुक्तिरजत आदिके समान * घटादि द्वैतप्रपञ्चका
बाध नहीं देखा जाता है, अतः घटादिप्रपञ्च भ्रान्तिसिद्ध है, यह कहना अनु-
चित है ? यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि बाधका दर्शन न होनेपर भी
देश, काल आदिसे व्यवहित वस्तुके समान घट आदिमें रहनेवाले भेदरूप
वस्तुओंका प्रत्यक्षायोग्यत्व ही घटादिके भ्रान्तिसिद्धत्वमें प्रयोजक है ।
जैसे कि इन्द्रियव्यापारके अनन्तर प्रतीयमान घट आदि अन्य सभी से
भिन्न ही प्रतीत होते हैं, क्योंकि उस समय घटादिमें रहनेवाले भेदमें संशय
और विपर्ययका अवभास नहीं होता है । और जहांपर स्थाणुप्रभृतिमें पुरुषत्व
आदिका सन्देह होता है, वहाँ भी पुरुषत्वादिसे अन्य पदार्थोंका असंदिग्ध
* तात्पर्य यह है कि शुक्तिमें रजतका भ्रम होनेके अनन्तर दोष आदिकी निवृत्ति होनेपर 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस प्रकार बाधज्ञान होता है, इसी प्रकार घटादि द्वैतप्रपञ्चका बाध नहीं होता है, इसलिए घटादि द्वैतप्रपञ्चको भ्रान्तिसिद्ध कैसे मानना ? इस प्रकारका संशय होनेपर उत्तरदाता कहता है कि द्वैतप्रपञ्चका बाध नहीं देखा जाता है, इसका क्या अर्थ है, क्या श्रोतबाधका अदर्शन अर्थ है या प्रत्यक्षबाधका अदर्शन अर्थ है, अथवा यौक्तिकबाधका अदर्शन अर्थ है । प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतिसे बाध देखा जाता है, द्वितीयपक्ष अङ्गीकार करके तृतीयका 'बाधादर्शनेऽपि' इत्यादिसे निषेध करते हैं ।
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