सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextअहङ्कार आदिके अनुसन्धानका विचार] भाषानुवादसहित २०९
पिण्डाद् व्युच्चरन्तो विस्फुलिङ्गा इव स्वस्वावच्छिन्नेन वह्निनेव स्वस्वावच्छिन्ने-
नाऽनित्येन साक्षिणा भास्यन्ते इति युक्तं तेष्वपि संस्काराधानम् । यस्तु—
'घटैकाकारधीस्था चिद् घटमेवाऽवभासयेत् ।
घटस्य ज्ञातता ब्रह्मचैतन्येनावभासते ॥ ४ ॥'
इति कूटस्थदीपोक्तो विषयविशेषणस्य ज्ञानस्य विषयावच्छिन्नब्रह्म-
चैतन्यावभास्यत्वपक्षः, यश्च तत्त्वप्रदीपिकोक्तो ज्ञानेच्छादीनामनवच्छिन्न-
शुद्धचैतन्यरूपनित्यसाक्षिभास्यत्वपक्षः, तयोरपि चैतन्यस्य स्वसंसृष्टापरोक्ष-
रूपत्वाद् वृत्तिसंसर्गोऽवश्यं वाच्य इति तत्संसृष्टानित्यरूपसद्भावान्न तेषु
संस्काराधाने काचिदनुपपत्तिरिति ।
विस्फुलिङ्गसे युक्त वह्निसे प्रकाश होता है, वैसे ही ज्ञान, सुख आदि अन्तःकरण-
वृत्तियोंका स्व-स्वावच्छिन्न ‡ अनित्य साक्षीसे प्रकाश होता है । अतः अहङ्कार
आदिमें संस्कारोंका आधान युक्त ही है ।
जो कि—'घटैकाकारधीस्था०' ( घटाकारवृत्तिमें स्थित चिदाभास अर्थात्
घटाकारवृत्तिप्रतिविम्बित घटज्ञान घटको ही प्रकाशित करता है और घटकी
ज्ञातता [ घटमें रहनेवाली घटज्ञानकी विषयता अर्थात् विषयतासम्बन्धेन
विषयनिष्ठ ज्ञान ] ब्रह्मचैतन्यसे ही प्रकाशित होती है ) इस प्रकार कूट-
स्थदीपमें कहा गया—'विषयके विशेषणीभूत ज्ञानका विषयावच्छिन्न
ब्रह्मचैतन्यसे प्रकाश होता है'—यह पक्ष और तत्त्वप्रदीपिकामें कहा
गया—'ज्ञान, इच्छा आदि अनवच्छिन्न-शुद्ध चैतन्यरूप नित्य साक्षीसे
प्रकाशित होते हैं'—यह पक्ष—इन दोनों पक्षोंमें भी चैतन्यके स्वसंसृष्ट
वस्तुके अपरोक्ष ज्ञानरूप होनेसे वृत्तिका सम्बन्ध अवश्य अपेक्षित है,
इसलिए इच्छा आदि-वृत्तिसे संसृष्ट साक्षीका अनित्यरूप होनेसे इच्छा
आदिमें संस्कारके आधानमें कोई अनुपपत्ति नहीं है* ।
(वृत्तिसे) अवच्छिन्न चैतन्य साक्षीसे प्रकाशित होती हैं । चैतन्यके सचमुच नित्य होनेपर
भी भास्यरूपसे अवच्छेदकरूपसे उत्पद्यमान अहङ्कार आदि धर्मोंके अनित्य होनेसे उन धर्मोंसे
विशिष्ट उनका अवभासक चैतन्य अनित्य है, अतः उसकी सूक्ष्मावस्थारूप उन धर्मोंका संस्कार
उत्पन्न हो सकता है, इसलिए वृत्ति आदिका स्वगोचर संस्कार द्वारा स्मरण हो सकता है ।
‡ प्रकृतमें स्वपदसे अहङ्कारका और द्वितीय स्वपदसे वृत्तिका ग्रहण है। यद्यपि साक्षी
वस्तुतः नित्य है, तथापि औपाधिक अनित्यत्व उसमें है, यह भाव है ।
* प्रकृतमें शङ्काका भाव यह है कि ऊपरके 'घटैकाकार' इत्यादि कहे गये दो पक्षोंमें यह
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