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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 238 of 590

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Page 238
२०८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

पत्त्या वृत्तिगोचरवृत्त्यन्तरस्यानुव्यवसायनिरसनेन निरस्तत्वात् । किन्तु यद्वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्येन यत् प्रकाशते, तद्वृत्त्या तद्गोचरसंस्काराधानमित्येव नियमः । एवं च ज्ञानसुखादयोऽप्यन्तःकरणवृत्तयः तन्मायः-

कारण कि अनवस्थाके भयसे वृत्तिगोचर अन्य वृत्तिका अनुव्यवसायके निराससे निरास किया गया है, किन्तु जिस वृत्तिसे युक्त चैतन्यसे जिसका प्रकाश होता हो, उस वृत्तिसे उस वस्तुके संस्कारोंका आधान होता है, ऐसा ही नियम है † । इससे तपे हुए लोहेके पिण्डसे निकलते हुए विस्फुलिङ्गका—जैसे


लिए अन्य वृत्ति माननी पड़ेगी, इस अवस्थामें अनवस्थासे अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगेगा, क्योंकि जैसे प्रथम वृत्तिके स्मरण आदिके लिए द्वितीय वृत्ति मानेंगे, वैसे ही द्वितीय वृत्तिके स्मरणके लिए तृतीय वृत्ति और तृतीय वृत्तिके स्मरणके लिए चतुर्थ वृत्ति, इस क्रमसे अनवस्था प्रसक्त होगी। अनवस्थाशब्दका अर्थ है अप्रामाणिक-अनन्तपदार्थकल्पनाप्रयुक्तअनिष्ट प्रसङ्ग अथवा क्लृप्त वस्तुसे सजातीय वस्तुओंकी परम्पराकी कल्पनाके विरामका अभाव, इसलिए वृत्तिगोचर अन्य वृत्ति नहीं मान सकते हैं, अतः प्रकृतमें उक्त शङ्काका स्थान है नहीं ।

† इस नियमका भाव यह है—यह बात पूर्वमें ही कही जा चुकी है कि अप्रयोजक होनेसे स्वाकार वृत्तिसे युक्त साक्षीसे ही स्वगोचर संस्कारोंका आधान होता है, यह नियम नहीं है, किन्तु जिस वस्तुके आकारमें परिणत वृत्तिमें प्रतिफलित चैतन्यमें जितनी वस्तुओंका आभास होता हो, उस वस्तुके आकारमें परिणत वृत्तिसे प्रकाशित सम्पूर्ण वस्तुओंमें संस्कारोंका आधान होता है। घटाकार वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यमें पटका प्रकाश नहीं होता है, अतः उस वृत्तिसे पटके संस्कारका आधान नहीं होता है, इसलिए पूर्वोक्त अतिसंकुचित नियम माननेकी आवश्यकता नहीं है। घटायाकार वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यमें अहङ्कारका भी प्रकाश होता है, इस विषयका निरूपण मूलमें ही 'स्वसंसृष्ट' इत्यादि ग्रन्थसे किया गया है, अतः अहङ्कारगोचर संस्कारका आधान होगा। प्रकृतमें और एक शङ्का होती है कि यद्यपि अहङ्कार आदिका उक्त वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे प्रकाश होनेसे तद्गोचर संस्कारका आधान हो सकता है, तथापि उक्त चैतन्यसे वृत्तिका तथा सुख और दुःख आदिका प्रकाशन नहीं होनेसे उससे वृत्ति आदिमें संस्कारका आधान कैसे होगा ? इस शङ्काके समाधानार्थ यदि वृत्ति आदि गोचर वृत्ति मानी जायगी, तो अनवस्था प्रसक्त होगी ? और यदि वृत्ति आदिकी वृत्तियोंको क्रियारूप न मानकर ज्ञानरूप स्वीकार करके अनवस्थाका परिहार किया जाय, तो भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानरूप वृत्तिका उत्पादक ही कोई नहीं है—मन ज्ञानका करण नहीं है, इसका आगे विचार किया जायगा, क्रियारूप मानेंगे, तो अनवस्थापिशाचिनी अवश्य उतरेगी, इससे वृत्ति आदिके संस्कारोंकी अनुपपत्तिका प्रसङ्ग कैसे हटेगा ? इसपर 'एवं च' इत्यादि ग्रन्थसे परिहार करते हैं। भाव यह है कि अन्तःकरणमें जिन-जिन वृत्तियोंका उद्भव होता है, वे चाहे ज्ञानरूप हों या ज्ञानरूप न हो, परन्तु वे सबकी-सब स्वसे ( अहङ्कार या ज्ञान ) और स्व