सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
Page 229 of 590
Read in contextसाक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भाषानुवादसहित १९९
गतिप्रतिहतौ बहुलीभावादधिकप्रकाशः, भास्वरदर्पणादिसम्बन्धेन गतिप्रतिहतौ बहुलीभावात् तदीयदीप्तिसंवलनाच्च ततोऽप्यधिकप्रकाश इति तत्राऽभिव्यञ्जकोपाधिकाभिव्यक्तितारतम्यानभ्युपगमात् । दृष्टान्तसम्प्रतिपत्तौ च गगनप्रसृतसौरालोकवत् अनवच्छिन्नानन्दस्याऽस्पष्टता, करतलाद्यवच्छिन्नसौरालोकवत् सुखवृत्त्यवच्छिन्नानन्दस्याऽधिकाभिव्यक्तिरिति मुक्तितः संसारस्यैवाऽभ्यर्हितत्वापत्तेश्च । एतेन 'संसारदशायां प्रकाशमानोऽप्यानन्दो मिथ्याज्ञानतत्संस्कारविक्षिप्ततया तीव्रवायुविक्षिप्तप्रदीपप्रभावदस्पष्टं प्रकाशते, मुक्तौ तदभावात् यथावदवभासते' इत्यपि निरस्तम् । निर्विशेषस्वरूपानन्दे
अस्पष्ट प्रकाशमान है, उसकी करतलके सम्बन्धसे गति रुक जाती है, इस अवस्थामें वह (तेज) एकत्र जमा होकर अधिक प्रकाश करता है और अति निर्मल दर्पण आदिके सम्बन्धसे तेजकी गतिका प्रतिरोध होनेपर तेजकी जमावटसे और दर्पणकी प्रभाके सम्मिश्रणसे करतलगत प्रकाशसे भी अधिक प्रकाश होता है, अतः तेजस्थलमें अभिव्यञ्जक उपाधिके तारतम्यसे अभिव्यक्तिमें तारतम्य नहीं माना जाता है। किन्तु जमावट प्रयुक्त ही तारतम्य है ] यदि कथञ्चित् दृष्टान्तको मान लें, तो गगनमें गतिशील सूर्यके आलोकके समान अनवच्छिन्न आनन्दमें अस्पष्टता होगी और करतल आदिसे युक्त सूर्यके आलोकके समान सुखाकार वृत्तिसे युक्त आनन्दकी अधिक अभिव्यक्ति होगी, इसलिए मुक्तिकी अपेक्षासे संसार ही अभ्यर्हित—सभीका अभीष्ट प्रसक्त होगा * । इससे यह भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि संसारकालमें आनन्द प्रकाशमान है, तो भी मिथ्याज्ञान † और मिथ्याज्ञानके संस्कारसे विक्षिप्त होनेके कारण तीव्र वायुसे संचालित दीपकी प्रभाके समान वह अस्पष्ट-सा प्रकाशित होता है, और मुक्तिमें तो मिथ्याज्ञान
* अर्थात् सांसारिक सुख ही मुक्ति सुखकी अपेक्षासे अधिक उत्कृष्ट और स्थायी सिद्ध होंगे, अतः मुक्तिके उद्देश्यसे मुक्तिके साधनोंमें किसीकी प्रवृत्ति नहीं होगी, यह भाव है ।
† देहादि अनात्म पदार्थोंमें आत्मत्वग्रह और वस्तुतः आत्माके सम्बन्धसे वञ्चित पुत्रादिमें आत्मीयत्वग्रह ही मिथ्याज्ञान है, यही मिथ्याज्ञान जाग्रत् अवस्थामें स्वरूपानन्दके प्रकाशनमें विक्षेपक और उसकी अस्पष्टताका आपादक है, और इसी मिथ्याज्ञानसे उत्पन्न हुए संस्कारके सुषुप्तिकालमें प्रकाशमान आनन्दके विक्षेपक और पुरुषार्थत्वका विनाशक हैं, क्योंकि प्रारब्धकर्मके बलसे सभी जीव सौषुप्त आनन्दका त्यागकर जाग्रत्में आ जाते हैं, अतः मुमुक्षु लोग सौषुप्त आनन्दकी अभिलाषा नहीं करते हैं, यह शङ्काका भाव है, और दीपप्रभा दृष्टान्त है ।