सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context१९८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
श्रुतिर्वदतीति चेत् ? । को वा ब्रूते श्रुतिर्न वदतीति । किन्तु अद्वैतवादे तदुपपादनमशक्यमित्युच्यते ।
नन्वेकस्यैव सौरालोकस्य करतलस्फटिकदर्पणाद्यभिव्यञ्जकविशेषोपधानेनाऽभिव्यक्तितारतम्यदर्शनादेकत्वेऽप्यानन्दस्याऽभिव्यञ्जकसुखवृत्तिभेदोपधानेनाऽभिव्यक्तितारतम्यरूपमुत्कर्षापकर्षवत्त्वं युक्तमिति चेत्, न; दृष्टान्तासंप्रतिपत्तेः । सर्वतः प्रसृमरस्य सौरालोकस्य गगने विना करतलादिसम्बन्धमस्पष्टं प्रकाशमानस्य निम्नतले प्रसृमरस्य जलस्येव करतलसम्बन्धेन
आनन्दका उत्तरोत्तर उत्कर्ष श्रुति कहती है, तो यह कौन कहता है कि श्रुति नहीं कहती है ? अर्थात् श्रुति आनन्दका उत्कर्ष कहती तो अवश्य है, परन्तु अद्वैतवादमें उसका उपपादन करना असम्भव है, यह हमारा ( पूर्वपक्षी का ) अभिप्राय है । यदि यह कहा जाय कि जैसे सूर्यके तेजके एक होनेपर भी करतल, स्फटिक और दर्पण आदि विशेष अभिव्यञ्जक पदार्थोंके * उपधान से आलोकाभिव्यक्तिमें कुछ तारतम्य देखा जाता है, वैसे ही यद्यपि स्वतः आनन्द एकरूप है, तथापि अभिव्यञ्जक सुखवृत्तिविशेषके उपधानसे आनन्दकी अभिव्यक्तिमें तारतम्यरूप उत्कर्ष और अपकर्ष हो सकते हैं ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आपका दिया हुआ जो दृष्टान्त है, उसमें हमारी सम्प्रतिपत्ति—सम्मति नहीं † है, क्योंकि जैसे स्वभावतः निम्नभू-भागमें गमनशील जलकी करतलके सम्बन्धसे गतिका प्रतिबन्ध होनेपर एकस्थानमें उसका अधिक जमाव हो जाता है, वैसे ही सर्वत्र गमनशील सूर्यका तेज, जो गगनमें किसी करतल आदिके सम्बन्धके बिना
* तात्पर्य यह है कि करतल आदिके सम्बन्धके बिना तेजकी जो आकाशमें अभिव्यक्ति होती है, उसकी अपेक्षासे करतलमें अधिक अभिव्यक्ति होती है, करतलकी अपेक्षा स्फटिकमें अधिक होती है, उसकी अपेक्षा दर्पणमें अधिक होती है, यह अनुभवसिद्ध है, इसीके अनुसार आनन्दकी अभिव्यञ्जक वृत्तियोंके प्रभावसे साक्षीरूप आनन्दमें भी उत्कर्ष और अपकर्ष हो सकता है, यह पूर्वपक्षकर्ता ( सिद्धान्ती )-का वक्तव्य है ।
† उत्तर देनेवाले पूर्ववादीका भाव यह है कि आपका आनन्दके विषयमें आलोकदृष्टान्त तभी हमें मंजूर हो सकता है, जब कि स्वतः तेज एक व्यक्ति हो, परन्तु आलोक एक व्यक्ति तो है नहीं, क्योंकि वह अनेक किरणोंका समूहरूप है और एक स्वरूप भी नहीं है, कारण कि तत्-तत् स्थानोंमें किरणोंकी अल्पता और बाहुल्य आदि नाना स्वरूप उपलब्ध होते हैं, अतः आलोकके दृष्टान्तसे साक्षीरूप आनन्दका तारतम्य नहीं सिद्ध कर सकते हैं ।