Skip to content
SarvaKosh
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished590 pages

Page 211 of 590

Read in context
Page 211

साक्षि-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १८१


चैतन्येन ईषत् सदा भास्यमेव देहद्वयं जीवचैतन्यस्वरूपप्रतिबिम्बगर्भादन्तः-करणाद् विच्छिद्य विच्छिद्योद्गच्छद्भिर्वृत्तिज्ञानैर्भास्यते। अन्तरालकाले तु सह वृत्त्यभावैः कूटस्थचैतन्येनैव भास्यते। अत एवाहंकारादीनां सर्वदा प्रकाशसंसर्गात् संशयाद्यगोचरत्वम्। अन्यज्ञानधाराकालीनाऽहंकारस्य 'एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवाऽऽसम्' इत्यनुसन्धानं च। न च कूटस्थप्रकाशिते

कूटस्थ चैतन्य द्वारा साधारणरूपसे सदा भासमान ही उभय—स्थूल और सूक्ष्म—शरीर जीवचैतन्य-रूप प्रतिबिम्बसे युक्त अन्तःकरणसे—विच्छिन्न विच्छिन्न होकर कुछ कालके अनन्तर—निकलनेवाली वृत्तियोंसे स्पष्ट भासते हैं। अन्तरालकालमें अर्थात् कुछ-कुछ समयके व्यवधानसे होनेवाली वृत्तियोंके मध्य कालमें तो वृत्तिध्वंसोंके साथ कूटस्थ चैतन्यसे ही दोनों देह भासते हैं। इसीलिए अहंकार आदिका प्रकाशके साथ सर्वदा सम्बन्ध होनेसे संशय † आदिकी विषयता उनमें नहीं आती है। और अन्य धारावाहिक ज्ञानकालिक ✠ 'अहम्' अर्थका—'इतने समय तक मैं इसे देखता ही रहा' इस प्रकार—स्मरण भी उपपन्न होता है। यदि अहमर्थ और


अवगत नहीं होगा, क्योंकि दीप आदिके समान वृत्तियोंके प्रकाशात्मक होनेपर भी वे स्वतः जड़ हैं, अतः वे स्थूल और सूक्ष्म देहको प्रकाशित करनेमें असमर्थ हैं। अतः साक्षिचैतन्य मानना चाहिए। दूसरी बात यह है कि वृत्तियोंके मध्यकालमें शरीरद्वयका अस्पष्ट भान होता है, और वृत्तियोंके अनन्तर 'मैं स्थूल हूँ' और 'मैं कर्ता हूँ' इत्यादिरूपसे स्पष्ट भान होता है। इसलिए अस्पष्ट भानकी उपपत्तिके लिए वृत्तिज्ञानसे अतिरिक्त साक्षी अवश्य मानना चाहिए। किंच, यदि साक्षी न माना जाय, तो वृत्तिकी उत्पत्ति और वृत्तिका विनाश जो प्रत्यक्षरूपसे भासते हैं, उनका भान नहीं होगा, क्योंकि अपनेसे अपना विनाश और उत्पत्ति नहीं देखी जाती है। इससे भी साक्षिचैतन्य अपेक्षित है।

† तात्पर्य यह है कि जैसे घट आदिमें क्षणिक प्रकाश आदिके सम्बन्धसे संशय आदि नहीं होते, वैसे ही 'मैं हूँ या नहीं' 'मैं जीता हूँ या नहीं' इस प्रकार अहंकार आदिका अस्तित्व-संशय किसीको नहीं होता है और सदा अपरोक्ष भान होता है, इसलिए नित्य प्रकाशके साथ उसका सम्बन्ध है, ऐसा मानना चाहिए, वह प्रकाश साक्षी ही है, यह भाव है।

  • जब भगवान् रामचन्द्रकी मूर्त्तिका दीर्घकाल तक ध्यान करते हैं, उस समयमें मूर्ति-विषयक वृत्तियोंकी धारा चलती है, इस धाराके समयमें अहमर्थका और तद्गोचर वृत्तियोंका तत्कालजन्मानुभव न होनेसे तद्विषयक संस्कार नहीं होंगे। इससे उत्तरकालमें अहमर्थका स्मरण नहीं होगा, इसलिए अन्य धाराकालीन अहंकारका साक्षीरूपसे अनुसन्धान होता है, अतः साक्षी मानना चाहिए। यदि धाराकालमें अन्यानुभव माना जाय, तो धाराके विच्छेदका प्रसङ्ग आवेगा, यह भाव है।