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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 210 of 590

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Page 210
१८०सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ प्रथम परिच्छेदं

अथ कोऽयं साक्षी जीवातिरेकेण व्यवह्रियते ?

अत्रोक्तं कूटस्थदीपे—देहद्वयाधिष्ठानभूतं कूटस्थचैतन्यं स्वावच्छेदकस्य देहद्वयस्य साक्षादीक्षणान्निर्विकारत्वाच्च साक्षीत्युच्यते । लोकेऽपि ह्यौदासीन्यबोधाभ्यामेव साक्षित्वं प्रसिद्धम् । यद्यपि जीवस्य वृत्तयः सन्ति देहद्वयभासिकाः, तथाऽपि सर्वतः प्रसृतेन स्वावच्छिन्नेन कूटस्थ-


अब शङ्का करते हैं कि जीवभिन्न जो साक्षीका व्यवहार किया जाता है, वह कौन है ? [ तात्पर्य यह है कि सुख आदिके धर्मी अहङ्कार साक्षि-प्रत्यक्षका विषय कहा गया है, इससे यह प्रतीत होता है कि जीवभिन्न कोई साक्षी है, क्योंकि सुख आदिके धर्मी अहङ्कारमें जीवत्वकी ही प्रसिद्धि है । इसलिए जीवभिन्न साक्षीमें कोई प्रमाण न होनेसे उसका स्वीकार अयुक्त है ] ।

इस शङ्काके समाधानमें कूटस्थदीपमें कहा गया है कि स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अधिष्ठानभूत कूटस्थ चैतन्य अपने अवच्छेदक उक्त दो शरीरोंका साक्षात् द्रष्टा है और कर्तृत्व आदि विकारोंसे शून्य है, अतः वह* साक्षी कहा जाता है, लोकमें भी औदासीन्य और ज्ञानसे ही साक्षित्व प्रसिद्ध है अर्थात् लोकमें वही साक्षी होता है, जो उदासीन और ज्ञाता होता है । [ इसी प्रकार प्रकृतमें भी साक्षी उदासीन और द्रष्टा ही सिद्ध होता है, यह भाव है ] । यद्यपि दोनों शरीरोंका अवभास करनेवाली जीवकी—अन्तःकरणकी—वृत्तियां हैं, अतः उन्हींसे काम चलेगा, * तथापि सर्वत्र व्यापक देहद्वयावच्छिन्न


* 'साक्षात् द्रष्टरि संज्ञायाम्' इस सूत्रसे द्रष्टा अर्थमें साक्षात्शब्दसे इनि प्रत्यय करके साक्षी शब्द बना है । साक्षीका लक्षण भी बोद्धा होकर जो उदासीन हो अर्थात् 'द्रष्टृत्वे सति उदासीनत्वं साक्षित्वम्' यही होता है । लोकमें दो आदमियोंमें जहाँ झगड़ा होता है, वहाँ साक्षी वही बन सकता है, जो उनके विवादका द्रष्टा हो और स्वयं उदासीन हो । केवल उदासीनत्व भी साक्षीका लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि समीपवर्ती स्तम्भ आदि अनेक उदासीन हैं, अतः उनमें साक्षीका उक्त लक्षण चला जायगा, यदि केवल द्रष्टृत्व साक्षीका लक्षण कहा जाय तो झगड़ा करनेवाला भी द्रष्टा है, लेकिन वह साक्षी नहीं होता है, अतः कथित लक्षण ही युक्त है ।

* शङ्काका तात्पर्य यह है कि जीवसे अतिरिक्त स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अवभासक नित्यसाक्षिचैतन्य क्यों माना जाता है ? क्योंकि उक्त देहद्वयका अवभास तो प्रकाशरूप अन्तःकरणकी वृत्तियोंसे भी हो सकता है, इसी भावसे 'यद्यपि' इत्यादिसे शङ्का की गई है, जीव शब्दका अर्थ अन्तःकरण है । इसपर कहते हैं कि साक्षीके विना स्थूल सूक्ष्म शरीरका