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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 205 of 590

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Page 205

आवरणविभवस्वरूप-विचार] भाषानुवादसहित १७५

दूरस्थवृक्षे आप्तवाक्यात् परिमाणविशेषावगमेऽपि तद्विपरीतपरिमाणविक्षेप-
दर्शनाच्च विषयगताज्ञानानिवृत्तावपि पुरुषगताज्ञाननिवृत्तिरस्त्येव। 'शास्त्रार्थं
न जानामि' इत्यनुभूताज्ञानस्य तदुपदेशानन्तरं निवृत्त्यनुभवात्। अत एव
'अनुमेयादौ सुषुप्तिव्यावृत्तिः' इति विवरणस्य तद्विषयाज्ञाननिवृत्तिरर्थ
इत्युक्तं तत्त्वदीपने इति।

अन्ये पौरुषमज्ञानमाहुः शक्तिद्वयाश्रयम्।
परोक्षज्ञानतस्तत्राऽऽवरणांशपरिक्षयम् ॥ ८९ ॥

कोई लोग कहते हैं कि पुरुषवृत्ति एक ही अज्ञान आवरण और विक्षेप रूप दो
शक्तियोंसे युक्त है, उनमें से परोक्षज्ञानसे आवरणांशका विनाश होता है ॥ ८९ ॥

अत्यन्त आवश्यक हैं। दो प्रकारके अज्ञान होनेपर और परोक्षस्थलमें वृत्तिका
निर्गम न होनेसे दूर देशमें स्थित वृक्षमें शिष्टके * वाक्यसे परिमाणविशेषका
अवगम होनेपर भी उस परिमाणसे विपरीत परिमाणरूप (अल्पपरिमाणरूप)
विक्षेप देखा जाता है, अतः विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति न होनेपर भी
पुरुषगत अज्ञानकी निवृत्ति होती ही है। क्योंकि 'मैं शास्त्रार्थको † (शास्त्रोक्त
अर्थको) नहीं जानता हूँ' इस प्रकार अनुभूत शास्त्रार्थके अज्ञानकी शास्त्रके
अर्थके उपदेशके अनन्तर निवृत्ति होती है, ऐसा अनुभव होता है। इसीसे
'अनुमेयादौ सुषुप्तिव्यावृत्तिः' इस विवरणका तत्त्वदीपनमें यह अर्थ कहा है
कि अनुमेय आदि विषयमें अनुमिति आदि परोक्ष ज्ञानसे (पुरुषगत)
अज्ञानकी निवृत्ति होती है।


* भाव यह है कि किसी शिष्ट पुरुषने कहा कि दूरस्थ वृक्ष छोटा नहीं है, किन्तु समीपके वृक्षके समान बड़ा है, इस वाक्यसे जो ज्ञान होगा, वह परोक्ष होगा। उससे यदि विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति मानी जाय, तो विपरीत परिमाणकी जो दूरस्थ वृक्षमें उपलब्धि होती है, वह नहीं होगी, अतः उससे पुरुषगत अज्ञान ही निवृत्त होता है।

† इसका यह भाव है—'मैं शास्त्रके अर्थको नहीं जानता हूँ' इस वाक्यसे अनुभूत अज्ञानकी शास्त्रार्थके उपदेशके अनन्तर 'शास्त्रार्थका अज्ञान अब निवृत्त हुआ' इस प्रकार अज्ञान निवृत्तिका अनुभव होता है। शास्त्रका अर्थ दो प्रकारका है—धर्मरूप और ब्रह्मरूप। धर्मरूप जो शास्त्रका अर्थ है उसमें उपदेशजन्य ज्ञान परोक्ष ही है, अपरोक्ष नहीं है, इसलिए धर्मरूप विषयमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग नहीं है। अतः वहां पुरुषगत अज्ञानकी निवृत्ति होती है, यह कहना होगा। उपदेशजन्य ब्रह्मरूप अर्थमें भी परोक्षज्ञान होता है अन्यथा मनन आदिके विधानकी असङ्गति होगी, वह भी पुरुषगत अज्ञानकी ही निवृत्ति करेगा। अतः परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तन नहीं करता है, यह कहना असङ्गत है।

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