Skip to content
SarvaKosh
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished590 pages

Page 204 of 590

Read in context
Page 204

१७४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


ननु नाज्ञानविच्छित्तिः परोक्षज्ञानतस्ततः ।
भ्रान्तिजिज्ञासयोर्दृष्टेरत्र केचित् समादधुः ॥ ८७ ॥

परोक्ष ज्ञानसे अज्ञानका विनाश नहीं होता है, क्योंकि परोक्ष ज्ञानके बाद भ्रान्ति और जिज्ञासा होती है, इस शङ्काका कोई लोग निम्नलिखितरूपसे समाधान करते हैं ॥ ८७ ॥

ननु नाऽयमपि नियमः, परोक्षवृत्तेरनिर्गमेनाऽज्ञानानिवर्तकत्वादिति चेत् ।

द्विविधं विषयाज्ञानं साक्षिविक्षेपसङ्गतेः ।
अर्थगं पौरुषं चेति परोक्षात् पौरुषक्षयः ॥ ८८ ॥

साक्षीके और विक्षेपके सम्बन्धसे विषयका आवारक अज्ञान दो प्रकारका है—एक विषयमें रहनेवाला और दूसरा पुरुषमें रहनेवाला, इसलिए परोक्षज्ञानसे पुरुषमें रहनेवाला अज्ञान विनष्ट होता है ॥ ८८ ॥

अत्र केचिदाहुः—द्विविधं विषयावरकमज्ञानम् । एकं विषयाश्रितं रज्ज्वादिविक्षेपोपादानभूतं कार्यकल्प्यम् । अन्यत् पुरुषाश्रितम् 'इदमहं न जानामि' इत्यनुभूयमानम् । पुरुषाश्रितस्य विषयसंभिन्नविक्षेपोपादानत्वासम्भवेन, विषयाश्रितस्य 'इदमहं न जानामि' इति साक्षिरूपप्रकाशसंसर्गायोगेन द्विविधस्याऽप्यावश्यकत्वात् । एवं च परोक्षस्थले वृत्तेर्निर्गमनाभावाद्

अब फिर शङ्का करते हैं कि यह भी नियम नहीं है कि प्रत्येक प्रमा अज्ञानकी निवृत्ति करती है, क्योंकि परोक्ष वृत्तिका निर्गम नहीं होता है, अतः वह परोक्षवृत्तिरूप प्रमा अज्ञानकी निवर्तक नहीं हो सकती । [ और है तो वह प्रमा अतः 'प्रमामात्रमज्ञाननिवर्तकम्' इस नियममें व्यभिचार है, यह भाव है ] ।

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—विषयको आवरण करनेवाले अज्ञान दो प्रकारके होते हैं—एक तो विषयमें रहनेवाला रज्जु आदिके विक्षेपका ( सर्प आदिरूप विवर्तका ) उपादानकारणभूत कार्य द्वारा कल्पित अज्ञान और दूसरा 'मैं इसे नहीं जानता हूँ' इस प्रकारसे अनुभूयमान पुरुषमें रहनेवाला अज्ञान । जो पुरुषमें रहनेवाला अज्ञान है, वह अधिष्ठानभूत रज्जु आदि विषयके साथ तादात्म्यापन्न सर्पादि विक्षेपका उपादान नहीं हो सकता और जो विषयमें रहनेवाला अज्ञान है उसका 'मैं इसे नहीं जानता हूँ' इस प्रकारके साक्षीरूप प्रकाशके साथ सम्बन्ध नहीं है, इसलिए अज्ञानके दो भेद मानने