सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| १७२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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बाधमात्रं प्रामाण्यम् । प्रागवगतानवगतयोः पर्वततद्वृत्तिपावकयोरनुमिति-विषययोरबाधस्याऽविशेषेण उभयत्राऽप्यनुमितेः प्रामाण्यप्रसङ्गात् । न चेष्टापत्तिः । 'वह्नाव् अनुमितिः प्रमाणम्' इतिवत् 'पर्वतेऽप्यनुमितिः प्रमाणम्' इति व्यवहारादर्शनात् ।
विवरणे साक्षिसिद्धस्याऽज्ञानस्याऽभावव्यावृत्तिप्रत्यायनार्थानुमानादिवि-
(अज्ञानके) अनिवर्तक होनेपर भी 'ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है' इस नियमका भङ्ग नहीं हो सकता है, क्योंकि केवल विषयका अबाध प्रामाण्य नहीं है अर्थात् जिस ज्ञानके विषयका बाध न हो वही प्रमाण है, ऐसा प्रामाण्यका लक्षण नहीं है, कारण कि उसके प्रामाण्यलक्षण होनेपर 'पर्वतो वह्निमान्' ( पर्वतमें वह्नि है ) इत्यादि अनुमितिके विषयीभूत पर्वत और उसमें रहनेवाली वह्निका, जो क्रमशः अनुमितिके पूर्वमें ज्ञात और अज्ञात हैं, सामान्यरूपसे बाध नहीं है, अतः पर्वतांश और वह्न्यंशमें अनुमितिके प्रामाण्यकी प्रसक्ति होगी, और इसे इष्टापत्ति नहीं मान सकते हैं, कारण कि लोकमें जैसे 'वह्निमें अनुमिति प्रमाण है', यह व्यवहार देखा जाता है, वैसे 'पर्वतमें भी अनुमिति प्रमाण है', यह व्यवहार नहीं देखा जाता ।
और पराभिमत अभावरूप अज्ञानकी व्यावृत्तिका बोध करानेके लिए प्रयुक्त अनुमान आदिका—यद्यपि साक्षी द्वारा सिद्ध अज्ञान—विषय
वे वृत्तियाँ न्यायमतके समान प्रतिक्षणावस्थायिनी नहीं मानी गई हैं, प्रत्युत पांच छः क्षणावस्थायिनी मानी गई हैं, इसके बाद 'प्रतिक्षणे०' इत्यादि ग्रन्थसे न्यायमतका स्वीकार करके प्रतिक्षणावस्थायिनी वृत्तियोंका अभ्युपगम कर ज्ञानधाराकी उपपत्ति की है। इस मतमें यह शङ्का होती है कि प्रथम क्षणमें उत्पन्न वृत्तिसे ही अज्ञानका नाश होनेपर अनन्तर कालमें उत्पन्न हुई क्षणिक वृत्तियोंसे किस अज्ञानका नाश होगा ? यदि उत्तरकालीन वृत्त्यात्मक ज्ञान अज्ञानकी निवृत्ति नहीं करेगा, तो 'ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है' इस नियमका व्यभिचार होगा। इसपर उत्तर देते हैं कि ठीक है—ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होती है, परन्तु वही ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है, जो प्रमाण हो । और प्रमाण ज्ञान उसे कहते हैं जो अनधिगत और अबाधित विषयका अवगाहन करता हो, द्वितीयकालीन वृत्तिज्ञान अबाधितार्थविषयक है, परन्तु अनधिगतार्थविषयक नहीं है, क्योंकि वह स्मृतिके समान अधिगत विषयका ही अवगाहन करता है, पर्वतांशमें वह्न्यनुमितिका प्रामाण्य न हो, इसलिए केवल अबाधितार्थविषयकत्व—प्रामाण्य नहीं कह सकते हैं, अतः द्वितीयकालिक वृत्तियोंके प्रमाण न होनेसे उनके अज्ञाननिवर्तक न होनेपर भी कोई हानि नहीं है ।