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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 201 of 590

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Page 201

आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहितं १७१

न चैवं सति धारावाहिकद्वितीयादिज्ञानानामज्ञाननिवर्तकत्वं न स्यात्, स्थूलकालविशिष्टाज्ञानस्य प्रथमज्ञानेनैव निवृत्तेः। पूर्वापरज्ञानव्यावृत्तसूक्ष्मकालविशिष्टाज्ञानस्य तदविषयैर्द्वितीयादिज्ञानैर्निवृत्त्ययोगादिति वाच्यम्, धारावहनस्थले प्रथमोत्पन्नाया एव वृत्तेस्तावत्कालावस्थायित्वसम्भवेन वृत्तिभेदानभ्युपगमात्। तदभ्युपगमेऽपि बहुकालावस्थायिपञ्चषवृत्तिरूपत्वसम्भवेन परस्परव्यावृत्तस्थूलकालादिविशेषणभेदविषयत्वोपपत्तेः। प्रतिक्षणोद्यदनेकवृत्तिसन्तानरूपत्वाभ्युपगमेऽपि द्वितीयादिवृत्तीनामधिगतार्थमात्रविषयतया प्रामाण्याभावेनाऽऽवरणानिवर्तकत्वेऽप्यहानेश्च। नहि विषया-


हैं। अर्थात् धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीय आदि ज्ञान विशिष्टविषयक हैं और अज्ञान भी विशिष्टविषयक हैं, अतः समानविषयक होनेसे उनका परस्पर निवर्त्यनिवर्तकभाव हो सकता है, यह भाव है।

द्वितीयादि ज्ञानके और इनसे निवर्त्य अज्ञानके स्वभावतः विशिष्टविषयक होनेपर धारावाहिक द्वितीय आदि ज्ञान अज्ञानके निवर्तक नहीं होंगे, क्योंकि स्थूलकालविशिष्ट अज्ञानकी प्रथमज्ञानसे ही निवृत्ति हो जाती है, अतः ज्ञानके पूर्वापर कालसे व्यावृत्त जो सूक्ष्म काल—क्षण है उससे विशिष्ट विषयको आवृत्त करनेवाले अज्ञानका, सूक्ष्मकालविशिष्ट विषयका अवगाहन न करनेवाले द्वितीयादि ज्ञानसे, निरास नहीं होगा, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि धारावाहिक स्थलमें (अर्थात् जहाँ यह घट है, यह घट है, इत्यादिरूपसे ज्ञानकी धारा चलती हो, वहाँ) प्रथम कालमें उत्पन्न वृत्तिकी ही धारावाहिक कालपर्यन्त स्थिति मानते हैं, इससे वृत्तिका भेद ही नहीं माना जाता है। यदि वृत्तिका भेद माना जाय, तो भी धाराकी दीर्घकालपर्यन्त रहनेवाली पाँच छः वृत्तियोंका सम्भव होनेसे परस्पर व्यावृत्त स्थूलकाल आदि विशेषण-विशेष विषयत्वकी उपपत्ति हो सकती है। यदि ज्ञानधाराको—प्रतिक्षणमें उत्पन्न होनेवाली वृत्तियोंका प्रवाह—माने तो भी प्रथमवृत्तिसे उत्तरकालीन वृत्तियोंमें, केवल अधिगतार्थविषयकत्व होनेसे, प्रामाण्य न होनेके कारण* आवरणके


* शङ्काका तात्पर्य यह है कि पूर्व ग्रन्थमें धारावाहिक ज्ञानमें एक ही वृत्ति मानी गई है, उसके अनन्तर 'तदभ्युपगमेऽपि' इत्यादिसे धारा एकवृत्तिरूप नहीं मानी गई है किन्तु अनेक वृत्तिरूप मानी गई है, क्योंकि भाष्य आदिमें धारावाहिक ज्ञान अनेक वृत्तिरूप ही माना गया है।