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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 198 of 590

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Page 198
१६८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

न चैवं ज्ञानोदयेऽप्यावरणसम्भवाद्विषयानवभासप्रसङ्गः । अवस्थारूपाण्यज्ञानानि हि तत्तत्कालोपलक्षितस्वरूपावरकाणि, ज्ञानानि च यावत्स्वकालोपलक्षितविषयावरकाज्ञाननाशकानि । तथा च किञ्चिज्ज्ञानोदये तत्कालीनविषयावरकाज्ञानस्य नाशात् विद्यमानानामज्ञानान्तराणामन्यकालीनविषयावारकत्वाच्च न तत्कालीनविषयावभासे काचिदनुपपत्तिः ।

यदि शङ्का हो कि प्रथम ज्ञानसे आवारक अन्य अज्ञानोंका तिरस्कार न माना जाय, तो प्रथम ज्ञानकी उत्पत्ति होनेपर भी विषयका प्रकाश नहीं होगा क्योंकि अन्य अज्ञानकृत आवरणोंका सम्भव है ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, कारण कि अवस्थारूप जो अज्ञान हैं, वे तत्-तत् कालसे उपलक्षित स्वरूपका आवरण करते हैं और ज्ञान अपनी अवस्थिति तकका जो सम्पूर्णकाल है उससे उपलक्षित विषयावच्छिन्न चैतन्यके आवरकरूपसे विद्यमान अज्ञानके विनाशक हैं । [ तात्पर्यार्थ यह है कि अवस्थारूप जितने अज्ञान हैं वे सबके सब मूलाविद्याके समान सर्वदा विषयावच्छिन्न चैतन्यको आवृत करनेवाले नहीं हैं, क्योंकि ऐसा मानना व्यर्थ है, किन्तु यह उचित है कि कुछ काल तक कोई अज्ञान विषयचैतन्यका आवरण करता है और कोई अन्य कालमें आवरण करता है, इस प्रकार कालकी सीमासे वे अवस्थारूप अज्ञान आवारक हैं सम्पूर्ण काल तक आवारक नहीं हैं । अतः प्रथम उत्पन्न घटविषयक ज्ञान अपनी स्थितिके यावत्कालमें तदावारक अज्ञानका अवश्य नाश करेगा, इसलिए ज्ञानके उदित होनेपर विषयके अनवभासका प्रसङ्ग नहीं है, क्योंकि ज्ञानका यह स्वभाव है कि अपने उदयकालमें अपने विषयको आवृत करके बैठे हुए अज्ञानका निवर्तन करता है, इसलिए उक्त शङ्काका अवसर नहीं है ] । इस प्रक्रियासे एक ज्ञानकालमें अज्ञानान्तरके अनावारकत्व सिद्ध होनेपर घटादिविषयक किसी एक ज्ञानके उत्पन्न होनेपर उस ज्ञानके उदयकालमें विषयावारक एक अज्ञानका नाश होता है, और उस कालमें विद्यमान इतर अज्ञान अन्य कालमें विषयोंको आवृत करते हैं, अतः तात्कालिक विषयके


से परिपालन होनेसे दुःखप्रागभाव प्रायश्चित्तसाध्य है। वैसे ही द्वितीय वृत्तिके उदयसे प्रथम ज्ञान सिद्ध आवरणतिरस्कारकी उत्तरक्षणमें सत्ता है और उसके न रहनेसे नहीं है, अतः द्वितीयावृत्तिका फल आवरणतिरस्कार हो सकता है, यह भाव है।