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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 197 of 590

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Page 197

आवरणाभिभवस्वरूप-विचार ] भाषानुवादसहित १६७

'यस्मिन् सति अग्रिमक्षणे यस्य सत्त्वम्, यद्व्यतिरेके चाऽसत्त्वम्, तत् तज्जन्यम्' इति प्रागभावपरिपालनसाधारणलक्षणानुरोधेनाऽनावरणस्य द्वितीयादिवृत्तिकार्यत्वस्याऽपि लाभान्न तद्वैफल्यमिति ।

पर्यायेणावृत्तिर्न्यायचन्द्रिकाकृद्भिरीरिता ।
अर्थस्य मोहैर्वेधेन स्वकालावरणक्षतिः ॥ ८३ ॥

घट आदि विषयका अज्ञानसे क्रमशः आवरण होता है और ज्ञानसे अपनी विद्यमान दशामें ही अज्ञानका नाश होता है, ऐसा न्यायचन्द्रिकाकारका मत है ॥८३॥

न्यायचन्द्रिकाकृतस्त्वाहुः— केनचिज्ज्ञानेन कस्यचिदज्ञानस्य नाश एव । न त्वावरकाणामप्यज्ञानान्तराणां तिरस्कारः । तथा च धारावाहिक-द्वितीयादिवृत्तीनामप्येकैकाज्ञाननाशकत्वेन साफल्यम् ।


अन्य ( तद्विषयक ) वृत्तिका उदय हो, तो वह अज्ञानतिरस्कृत ही * रहता है । इस परिस्थितिमें 'जिसके रहनेपर उत्तर क्षणमें जिसका अस्तित्व होता है और जिसके न रहनेपर जिसका अस्तित्व नहीं होता, वह तज्जन्य अर्थात् उससे उत्पन्न होता है, इस प्रागभावके परिपालनमें साधारणजन्यत्वके लक्षणानुरोधसे † द्वितीयादि वृत्तिका अनावरणरूप ( आवरणाभाव ) कार्यका भी लाभ हो सकता है, अतः द्वितीयादि वृत्तिका वैफल्य नहीं है ।

न्यायचन्द्रिकाकार कहते हैं—किसी एक ज्ञानसे किसी एक अज्ञानका नाश होता ही है, अन्य आवरक अज्ञानोंका तिरस्कार नहीं होता, इसलिए धारावाहिक दूसरी वृत्तियोंसे भी एक-एक अज्ञानका नाश होता है, अतः उनकी निष्फलता नहीं है ।


* तात्पर्य यह है कि 'यह घट है' इस प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान एक अज्ञानका विनाश करता है और अन्यका तिरस्कार, और वह तिरस्कृत अज्ञान घटज्ञानके विनाशकालमें फिर उसी विषयको आवृत करता है । यदि विशेष जाननेकी इच्छासे प्रथम उत्पन्न घटज्ञानके विनाश-समयमें अन्य घटप्रत्यक्ष उत्पन्न हो तो, वह तिरस्कृत अज्ञान वैसा ही रहता है ।

† तात्पर्य यह है कि सादि और अनादि साधारण जन्यत्व—साध्यत्वका यह लक्षण है, कि जिसके रहनेपर जो रहे और न रहनेपर न रहे, वह उससे जन्य है । इस लक्षणका समन्वय इस प्रकार है—यस्मिन् सति—जिसके रहनेपर अर्थात् दण्डके रहनेपर अग्रिम क्षणमें—उत्तरक्षणमें घटरूप कार्य रहता है और दण्डके न रहनेपर घटरूप कार्य नहीं रहता है, अतः घट दण्डसे साध्य है । वैसे ही प्रायश्चित्तके होनेपर उत्तरक्षणमें दुःखप्रागभावकी सत्ता है और उसके न रहनेपर नहीं है, अतः दुःखप्रागभावका प्रायश्चित्त