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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 195 of 590

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Page 195

आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १६५


अन्ये त्वेकस्य विच्छेदमितरेषां पराभवम् ।
तं चावरणशक्तीनां प्रतिबन्धं प्रचक्षते ॥ ८० ॥

कोई लोग कहते हैं कि एक ज्ञानसे एक ही अज्ञानका नाश होता है और इतरोंका पराभव होता है, और अज्ञानोंकी आवरणशक्तियोंका प्रतिबन्ध पराभव कहा जाता है ॥८०॥

अपरे तु—अज्ञानस्य सविषयत्वस्वभावत्वात् उत्सर्गतः सर्वं सर्वदाऽऽवृणोत्येव । न च विषयोत्पत्तेः प्रागावरणीयाभावेनाऽऽवरकत्वं न युज्यते इति वाच्यम् , तदाऽपि सूक्ष्मरूपेण तत्सत्त्वादिति मन्यमानाः कल्पयन्ति--यथा बहुजनसमाकुले प्रदेशे कस्यचित् शिरसि पतन्नशनिरितरानप्यपसारयति ।

यथा वा सन्निपातहरमौषधमेकं दोषं निवर्तयद्दोषान्तरमपि दूरीकरोति, एवमेकमज्ञानं नाशयत् ज्ञानमज्ञानान्तराण्यपि तिरस्करोति । तिरस्कारश्च यावद् ज्ञानस्थितिः तावद् आवरणशक्तिप्रतिबन्ध इति ।

अज्ञानका सविषयत्व स्वभाव है अर्थात् अज्ञान किसी विषयका अवलम्बन किये बिना नहीं रहता, इससे स्वभावतः सभी अज्ञान अपनी सत्त्वदशामें सदा विषयका आवरण करते ही हैं । यदि यह शङ्का हो कि घट आदि विषयकी उत्पत्तिके पूर्वमें * आवरणीय ( आवरण करने योग्य ) विषयके न रहनेसे आवरकत्वकी उपपत्ति नहीं होगी ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उत्पत्तिके पूर्वकालमें भी सूक्ष्मरूपसे वह कार्य है, अतः आवरकत्वकी उपपत्ति हो सकती है, ऐसा मानते हुए कुछ लोग कल्पना करते हैं कि जैसे अनेक जनोंसे युक्तदेशमें किसी एक पुरुषके मस्तकके ऊपर गिरता हुआ वज्र अन्य पुरुषोंको हटा देता है ।

अथवा जैसे सन्निपातको हरण करनेवाली औषधि एक दोषका विनाश करती हुई अन्य दोषोंका भी निराकरण करती है, इसी प्रकार एक अज्ञानका विनाश करता हुआ ज्ञान इतर अज्ञानोंका भी तिरस्कार करता है । और जब तक ज्ञानकी स्थिति रहती है, तब तक आवरणशक्तिका प्रतिबन्ध होता है ।


* तात्पर्य यह है कि इस मतमें यह कहते हैं कि सब अज्ञान सब विषयोंको सदा आवृत्त करते हैं, इसलिए घटकी उत्पत्तिके पूर्वमें घट आदि विषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण करता है, यह प्रतीत होता है, परन्तु यह नहीं हो सकता, क्योंकि अज्ञानका सविषयत्व स्वभाव होनेसे विषयके न रहनेके कारण तदवच्छिन्न चैतन्यरूप आवरणीय भी नहीं है ।