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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 181 of 590

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Page 181

वृत्तिके साथ विषयका सम्बन्ध-विचार] भाषानुवादसहित १५१


न चैवं द्वितीयपक्षसाङ्कर्यम् । जीवस्य सर्वगतत्वे प्रथमः पक्षः, परिच्छिन्नत्वे द्वितीय इत्येव तयोर्भेदादित्याहुः ॥ ११ ॥

साक्षात्कारमें ( आपरोक्ष्यमें ) अध्याससिद्ध तादात्म्य सम्बन्ध ही नियामक है, ऐसा सिद्धान्त भी सङ्गत होता है, द्वितीय पक्षके साथ साङ्कर्य भी नहीं है ‡, क्योंकि जीवके व्यापकत्वपक्षमें प्रथम पक्ष है, और परिच्छिन्नत्वपक्षमें द्वितीय पक्ष है, इस प्रकारका उनमें भेद है ॥११॥


‡ सम्बन्धके लिए वृत्ति है, यह प्रथम पक्ष है, अभेदाभिव्यक्तिके लिए वृत्ति है, यह द्वितीय पक्ष है और आवरणाभिभवके लिए वृत्ति है, यह तृतीय पक्ष है। इनमें से प्रथम पक्षमें भी वृत्तिसे अभेदाभिव्यक्ति ही मानी जाय, तो द्वितीय पक्षसे प्रथम पक्षमें कोई वैलक्षण्य नहीं होगा, यह शङ्का करनेवालेका भाव है। इसपर उत्तर है कि जीवको व्यापक माननेवालोंके मतसे प्रथम पक्ष है और जो परिच्छिन्न मानते हैं, अर्थात् जिनके मतमें अन्तःकरणोपाधिक जीव है, उस मतसे द्वितीय पक्ष है, अतः साङ्कर्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि यद्यपि प्रथम और द्वितीय पक्षमें वृत्तिजन्य अभेदाभिव्यक्ति समान है, तो भी प्रथम पक्षमें अभेदकी अभिव्यक्ति द्वारा विषयावभासक जीवचैतन्यके विषयके साथ तादात्म्यका सम्पादन वृत्ति करती है। और द्वितीय पक्षमें वृत्तिसे—विषयावभासक जीवचैतन्य और विषयावच्छिन्न चैतन्य—की ही—अभेदाभिव्यक्ति होती है, अतः परस्पर उन पक्षोंमें साङ्कर्य नहीं है।

अथवा प्रथम पक्षमें व्यापक होनेसे विषयदेशमें सदा सन्निहित विषयावभासक जीवचैतन्यका विषयतादात्म्यापन्न घटाद्यैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति करनेके लिए वृत्ति है और द्वितीय पक्षमें जीवके परिच्छिन्न होनेसे वृत्ति उसको विषयके सान्निध्यमें ले जाती है, उसके बाद विषया-भिन्न घटाद्यैतन्यके साथ उसकी 'परिच्छिन्न जीवकी' अभेदाभिव्यक्तिका भी सम्पादन करती है, अतः उनका साङ्कर्य नहीं है। इस प्रकारका यह परिहार मूलमें कहे गये सर्वगतत्व और परिच्छिन्नत्व पदोंसे सूचित होता है और पूर्वका परिहार 'प्रथमपक्ष' और 'द्वितीयपक्ष' पदोंसे सूचित होता है।

वस्तुतस्तु साङ्कर्यका परिहार होता ही नहीं है, क्योंकि 'सम्बन्धार्था वृत्तिः' इस पक्षमें सम्बन्ध ही उद्देश्यरूपसे ज्ञात होता है और 'अभेदाभिव्यत्त्यर्था वृत्तिः' इस पक्षमें अभेदाभिव्यक्ति ही उद्देश्यरूपसे प्रतीत होती है, और पूर्वोक्त परिहारसे भी दोनों पक्षोंमें अभेदाभिव्यक्ति ही वृत्तिका प्रयोजन मालूम होता है, अतः साङ्कर्यका परिहार करना केवल वालुकाप्रासादावरोहणमात्र है, इसलिए 'एकदेशिनस्तु' ऐसे एकदेशीके पक्षसे ही इसका उपन्यास किया गया है।

वस्तुस्थितिमें 'सम्बन्धार्था वृत्तिः' (सम्बन्धके लिए वृत्ति है) इस प्रकार कहनेवाले आचार्योंका अभिप्राय यह है—विषयोंके अवभासक रूपसे अभिमत जीवचैतन्यका घट आदि विषयोंके साथ व्यङ्ग्यव्यञ्जकरूप सम्बन्ध तत्तत् विषयोंसे संसृष्ट वृत्तिसे उत्पन्न हुआ विवक्षित है। जैसे—अन्तःकरण अत्यन्त स्वच्छ होनेसे स्वयं ही चैतन्यके अभिव्यञ्जनमें समर्थ है, वैसे घट आदि चैतन्यको अभिव्यक्त नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वे अस्वच्छ हैं, किन्तु जब घट