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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 180 of 590

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Page 180
१५०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

एकदेशिनस्तु—अन्तःकरणोपहितस्य विषयाऽवभासकचैतन्यस्य विषयतादात्म्यापन्नब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्तिद्वारा विषयतादात्म्यसम्पादनमेव चिदुपरागोऽभिसंहितः । सर्वगततया सर्वविषयसन्निहितस्याऽपि जीवस्य तेन रूपेण विषयाऽवभासकत्वे तस्य साधारणतया पुरुषविशेषापरोक्ष्यव्यवस्थित्ययोगेन तस्याऽन्तःकरणोपहितत्वरूपेणैव विषयाऽवभासकत्वात् । एवं च विषयापरोक्ष्ये आध्यासिकसम्बन्धो नियामक इति सिद्धान्तोऽपि सङ्गच्छते ।


कुछ एकदेशियोंका मत है कि अन्तःकरणसे उपहित घट आदि विषयोंके अवभासक जीवचैतन्यका—विषयोंके साथ तादात्म्यरूपको प्राप्त हुए ब्रह्मचैतन्यके साथ अभेदकी अभिव्यक्ति द्वारा—घट आदि विषयके साथ तादात्म्यका सम्पादन ही * चिदुपरागशब्दसे कहा जाता है । जीवके व्यापक (सर्वगत) होनेसे सब विषयोंका सन्निधान होनेपर भी उसको सर्वगतरूपसे विषयोंका अवभासक माना जायगा, तो प्रत्येक पुरुषके प्रति जीवके साधारण होनेसे पुरुष विशेषके अपरोक्ष्यकी व्यवस्थिति नहीं होगी, इसलिए उसको—अन्तःकरणोपहितत्वरूपसे † ही—विषयोंका अवभासक माना जाता है । विषयावभासक जीवचैतन्यका वृत्तिसे विषयतादात्म्य सम्पादनके स्वीकार होनेपर विषयके


* इन एकदेशियोंका कहना है कि अन्तःकरणके प्रति यदि जीवचैतन्य उपादान हो तो अन्तःकरणवृत्तिका भी उपादान और अधिष्ठान होकर उसके साथ वृत्तिका तादात्म्य हो, परन्तु यह नहीं है, इसलिए विवरणाचार्यको उक्त परम्परासम्बन्ध अभिप्रेत नहीं है । कारण कि खुद विवरणाचार्यने कहा है—'एवं विषयासङ्गत्वपि जीवः स्वभावदन्तःकरणेन संसृज्यते' ( यद्यपि जीवका विषयोंके साथ सम्बन्ध नहीं है, तथापि स्वभावसे ही अन्तःकरणके साथ उसका सम्बन्ध रहता है ) गोत्वादि जातिका जैसे स्वभावसे गोव्यक्तिमें सम्बन्ध होता है, वैसे ही अन्तःकरणके प्रति जीवके उपादान न होनेपर भी उसका स्वभावतः अन्तःकरणसे ही संसर्ग है, अतः संयोगजसंयोग भी विवरणाचार्यको अभिमत नहीं है, इसलिए एकदेशीके मतका उपक्रम है । यद्यपि बिम्बभूत ब्रह्म चैतन्यके विषयोंके प्रति उपादान होनेसे ब्रह्म और विषयका तादात्म्य पूर्वसे ही सिद्ध है, तथापि विषयतादात्म्यापन्न ब्रह्मकी और विषयावभासक जीवचैतन्यकी वृत्तिद्वारा अभेदाभिव्यक्ति होनेसे जीवचैतन्यका विषयके साथ वृत्तिसे ही तादात्म्य सिद्ध होता है, अतः वृत्तिमें तादात्म्य निर्वाहकत्वकी अनुपपत्ति नहीं है ।

† अर्थात् जीव सर्वगत है, तथापि जिस पुरुषके अन्तःकरणसे उपहित होकर जिस अर्थका अवभास करेगा, वही अर्थ उसीको अपरोक्ष होगा अन्यको नहीं, इस प्रकारकी व्यवस्था-सिद्धिके लिए अन्तःकरणोपहितत्व दिया गया है, यह भाव है ।


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