सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| १२६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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शरीरात्' (उ० मी० अ० ४ पा० २ सू० १२) इत्यधिकरणे बद्धमुक्तत्व-प्रतिपादकभाष्यस्य च नाऽऽञ्जस्यमित्यपरितुष्यन्तोऽन्तःकरणादीनां जीवोपाधित्वाभ्युपगमेनाऽनेकजीववादमाश्रित्य बद्धमुक्तव्यवस्थां प्रतिपद्यन्ते ।
प्रतिजीवमविद्यांशा भिन्ना ब्रह्मावृत्तिक्षमाः ।
तन्नाशक्रमतो मुक्तिव्यवस्था कैश्चिदीर्यते ॥ ४६ ॥
कोई लोग कहते हैं कि प्रत्येक जीवमें अविद्याके अंश भिन्न-भिन्न हैं और वे ब्रह्मका आवरण करनेमें समर्थ हैं और उनके नाशक्रमसे मुक्तिकी व्यवस्था है ॥४६॥
तेषु केचिदेवमाहुः—यद्यपि शुद्धब्रह्माश्रयविषयमेकमेवाऽज्ञानम्, तन्नाश एव च मोक्षः, तथापि जीवन्मुक्तावज्ञानलेशानुवृत्त्यभ्युपगमेनाऽज्ञानस्य सांशत्वात् तदेव क्वचिदुपाधौ ब्रह्मावगमोत्पत्तौ अंशेन निवर्तते, उपाध्यन्तरेषु यथापूर्वमंशान्तरैरनुवर्तते इति ।
इस अधिकरणमें बद्धत्व और मुक्तत्वका प्रतिपादन करनेवाले भाष्यके साथ सामञ्जस्य नहीं है अर्थात् उक्त श्रुति और भाष्यकी अनुपपत्ति है ।
उन अनेकजीववादियोंमें से कुछ लोग यह कहते हैं कि यद्यपि शुद्ध ब्रह्मका आश्रय और उसको विषय करनेवाला अज्ञान एक ही है, और उसके नाश होनेसे ही मोक्ष होता हैं † तथापि जीवन्मुक्तिमें अज्ञानके विक्षेपांशकी अनुवृत्तिका स्वीकार होनेसे अज्ञान सांश है, इससे जिस उपाधिमें (जीवरूप अधिकरणमें) ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति होगी, उसी स्थलमें अंशतः अज्ञानकी निवृत्ति होगी और अन्य स्थलमें पूर्ववत् अन्य अंशोंसे अज्ञानकी अनुवृत्ति होगी ।
उन श्रुतियों और स्मृतियोंका एकजीववादमें भी तात्पर्य नहीं है, ऐसा कह सकते हैं। यह भी नहीं कह सकते हैं कि अविद्याके एक होनेसे तदवच्छिन्न जीव एक है, क्योंकि कथित श्रुति और स्मृतिके आधारपर अविद्याका अनेकविधत्व भी सम्भव है और एकत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य जातिके अभिप्रायसे भी लगा सकते हैं अर्थात् अविद्यात्व जातिके एक होनेसे अविद्या एक है, ऐसा कहा गया है । कदाचित् अविद्याको एक माना जाय, तो भी 'कार्योपाधिरयं जीवः' इत्यादि उदाहृत पूर्वकी श्रुतिके बलसे नाना अन्तःकरण ही जीवकी उपाधियाँ हैं, ऐसा भी स्वीकार कर सकते हैं, अतः अनेकजीववादमें विरोध नहीं है, यह भाव है ।
† विशिष्ट जीव और ईश्वर अज्ञानके आश्रय नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वे स्वयं ही अज्ञानसे कल्पित हैं, अतः शुद्ध ब्रह्म ही उसका आश्रय है, इसी प्रकार अज्ञानविषयत्व अर्थात् अज्ञानावृतत्वरूपविषयत्व भी शुद्धमें है ईश्वरमें नहीं है, क्योंकि जैसे औपाधिक भेदसे