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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 155 of 590

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Page 155

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १२५


बद्धमुक्तव्यवस्थार्थमन्तःकरणभेदतः ।
जीवभेदं परे प्राहुः, व्यवस्था चाऽत्र कीदृशी ॥ ४५ ॥

बद्ध और मुक्त की व्यवस्थाके लिए अन्तःकरणके भेदसे जीवोंका भेद है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं । इस अनेकजीववादमें बद्ध और मुक्तकी व्यवस्था कैसी है ?॥४५॥

इतरे त्वत्रापि बद्धमुक्तव्यवस्थाऽभावस्य तुल्यत्वेन 'तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्' इत्यादिश्रुतेः 'प्रतिषेधादिति चेन्न

योगीके दृष्टान्तसे कथित नियममें व्यभिचार नहीं है अर्थात् सुख आदिके अनुसन्धानमें योगप्रभावसे असहकृत शरीरभेदको प्रयोजक मानेंगे, योगीका शरीरभेद है, परन्तु वे योगप्रभावसे असहकृत नहीं हैं किन्तु सहकृत हैं अतः व्यभिचार नहीं है ] ।

कुछ लोग इस मतसे सन्तुष्ट न हो अन्तःकरण आदिको जीवकी उपाधि मानकर, अनेकजीववादका आश्रय करके बद्ध और मुक्तकी व्यवस्था करते हैं, क्योंकि पूर्वके समान इस मतमें भी बद्ध और मुक्तकी व्यवस्थाका अभाव समान होनेसे 'तद्यो यो देवानां०' ( देवोंमें से जिस देवने आत्माका साक्षात्कार किया, वही ब्रह्मरूप हो गया इत्यादि विद्वान्में मुक्तत्व और अविद्वान्में बद्धत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति और 'प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात्'*


* 'प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात्' इस सूत्रका यह अर्थ है—'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति' (उस ब्रह्मवेत्ताके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता ) इस काण्वशाखाकी श्रुतिसे ब्रह्मतत्त्ववेत्ताके प्राणोंका उत्क्रमण निषिद्ध होनेसे उसकी गति और उत्क्रान्ति नहीं होती है, यह नहीं कहना चाहिए, क्योंकि बृहदारण्यकमें 'न तस्मात् प्राणा उत्क्रामन्ति' (उससे प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता है) यह श्रुति ब्रह्मवेत्ताके शारीरका—जीवका—उपक्रम करके सुनी जाती है । इससे जीवसे प्राणोत्क्रमणका निषेध है शरीरसे नहीं अर्थात् विद्वान्के प्राणोंका भी शरीरसे उत्क्रमण होता है, इसलिए 'न तस्य' इत्यादि काण्वके श्रुतिका भी यही अर्थ करना चाहिए कि विद्वान्के प्राण जीवसे उत्क्रमण नहीं करते हैं, परन्तु उसके साथ-साथ ब्रह्मलोकमें जाते हैं। यह पूर्वपक्षसूत्र है ।

अनेकजीववादमें भी—'ब्रह्म ही अपनी अविद्यासे संसारी होता है और अपनी विद्यासे मुक्त होता है', ऐसा वृहदारण्यकभाष्यमें प्रतिपादन होनेसे विरोध समान ही है, ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि उस भाष्यका यह तात्पर्य है कि ब्रह्म ही अनेक अन्तःकरणरूपसे परिणत अपनी अविद्यासे अनेकजीवभावको प्राप्त करके संसारी होता है और अपनी विद्यासे क्रमशः मुक्त होता है । यदि कोई कहे कि श्रुति-स्मृतिके ठीक-ठीक पर्यालोचनसे उनका तात्पर्य अनेकजीववादमें नहीं ज्ञात होता है, अतः अनेकजीववाद असङ्गत है, नहीं, असङ्गत नहीं है, क्योंकि तुल्ययुक्त्या उन

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