सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| १२२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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सूत्रमेकं परं जीवपदाभासान् परान् परे ।
कुछ लोग यह कहते हैं कि एक सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ मुख्य जीव है और अन्य सभी जीव जीवाभास हैं ॥
अन्ये त्वस्मिन्नेकशरीरैकजीववादे मनःप्रत्ययमलभमानाः 'अधिकं तु भेदनिर्देशात्' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० २२ ) 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० ३३ ) इत्यादिसूत्रैर्जीवाधिक ईश्वर एव जगतः स्रष्टा, न जीवः । तस्याऽऽप्तकामत्वेन प्रयोजनाभावेऽपि केवलं लीलयैव जगतः सृष्टिरित्यादि प्रतिपादयद्भिर्विरोधं च मन्यमाना हिरण्यगर्भ एको ब्रह्मप्रतिबिम्बो मुख्यो जीवः । अन्ये तु तत्प्रतिबिम्ब-
कि जैसे स्वप्नसे उठा हुआ पुरुष स्वप्नभ्रमसे सिद्ध अन्य पुरुषकी मुक्तिको अन्यके प्रति कहता है, वैसे ही जीवके भ्रमात्मक ज्ञानसे सिद्ध शुक आदिकी मुक्ति श्रवण आदिमें पुरुषोंकी प्रवृत्तिके लिए कही गई है । इस एक जीव-वादमें सम्भावित सम्पूर्ण शङ्कारूप कीचड़का प्रक्षालन स्वप्नदृष्टान्तरूप जल-धारासे ही करना चाहिए—जैसे कोई शङ्का करे कि यदि जीव एक ही है, तो विद्याके उपदेशक अन्यका अभाव होनेसे ज्ञान नहीं होगा और जीव तथा ईश्वरके विभक्त न होनेसे जीवका ईश्वरोपासना आदि व्यवहार भी नहीं होगा, ऐसी आशङ्का करके कहते हैं—'अत्र च' इत्यादिसे । जैसे स्वप्नदशामें स्वप्न देखनेवाला किसीको ईश्वर और किसीको गुरु मानकर उपासना करता है और उससे विद्या प्राप्त करता है, वैसे ही प्रकृतमें भी होगा, यह भाव है ।
कुछ लोग एकजीववादमें सन्तुष्ट न होकर अर्थात् प्रामाण्यनिश्चय न प्राप्त कर 'अधिकं तु भेदनिर्देशात्' 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' इत्यादि सूत्रोंके आधारपर जीवसे अन्य ईश्वर ही जगत्का स्रष्टा है, जीव स्रष्टा नहीं है, यद्यपि ईश्वरको कोई अभिलाषा नहीं है, क्योंकि वह आप्तकाम है, इसलिए जगत्के सर्जनमें उसका कोई प्रयोजन नहीं है, तथापि 'केवल लीला से ही जगत्की सृष्टि करता है' इत्यादि प्रतिपादन करनेवालोंके साथ जीवको सृष्टिकर्ता माननेमें विरोध मानते हुए ब्रह्मका प्रतिबिम्बभूत हिरण्यगर्भ ही एक मुख्य जीव है । हिरण्यगर्भसे अन्य इन्द्रादि तो हिरण्यगर्भके प्रतिबिम्बभूत