सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextजीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १२१
अथायं जीव एकः, उताऽनेकः ? अनुपदोक्तपक्षावलम्बिनः केचिदाहुः—
एको जीवः, तेन चैकमेव शरीरं सजीवम् । अन्यानि स्वप्नदृष्टशरीराणीव निर्जीवानि । तदज्ञानकल्पितं सर्वं जगत्, तस्य स्वप्नदर्शनवद्यावदविद्यं सर्वो व्यवहारः । बद्धमुक्तव्यवस्थाऽपि नास्ति, जीवस्यैकत्वात् । शुकमुक्तादिकमपि स्वाप्नपुरुषान्तरमुक्तादिकमिव कल्पितम् । अत्र च सम्भावितसकलशङ्कापङ्कप्रक्षालनं स्वप्नदृष्टान्तसलिलधारयैव कर्तव्यमिति ।
अत्र सन्देह होता है कि जीव एक है या अनेक हैं ? इस विषयमें अनुपदोक्त (ब्रह्म ही अपनी अविद्यासे संसारी होता है और अपनी विद्यासे मुक्त होता है, इस ग्रन्थसे कहे गये) पक्षका अनुसरण करनेवाले कुछ लोग कहते हैं—
जीव एक ही है [ ब्रह्म एक है और उसमें अवच्छेदवाद या प्रतिबिम्बवादका स्वीकार नहीं है, अतः जीवका भेद नहीं हो सकता है, यह भाव है ] । इससे एक ही शरीर जीवसे युक्त है और अन्य जितने शरीर हैं; वे सबके सब स्वप्नमें देखे जानेवाले शरीरोंके समान निर्जीव हैं । यह समस्त जगत् जीवके अज्ञानमात्रसे कल्पित है । जैसे जब तक निद्राकी निवृत्ति नहीं होती है, तभी तक स्वप्न देखा जाता है, वैसे ही जब तक जीवकी अविद्याका विनाश नहीं होता, तभी तक जीवके सब व्यवहार होते हैं । [ इस एक जीववादमें पूर्वपक्ष होता है कि यदि अज्ञानसे स्वप्नव्यवहारके समान यह समस्त जगत्का व्यवहार कल्पित है, तो जैसे स्वप्नव्यवहार एकदम नष्ट हो जाता है, वैसे ही जगत्का व्यवहार एकदम नष्ट हो जाना चाहिए, फिर विद्याकी स्वीकृति व्यर्थ है, इसपर इस ग्रन्थसे यह कहा गया है कि विद्या व्यर्थ नहीं है, क्योंकि जैसे कारणान्तरसे निद्रा आदिका क्षय होनेपर स्वप्नकी निवृत्ति होती है, वैसे ही ज्ञानसे अज्ञानान्धकारके निवृत्त होनेपर ही नाश होता है, समस्त संसारका विद्याके उदयके बिना अज्ञानका नाश नहीं होता और अज्ञानके नाशके बिना इस प्रपञ्चात्मक व्यवहारका लोप नहीं होता । अतः विद्या निरर्थक नहीं है ] इस पक्षमें बद्ध या मुक्तकी व्यवस्था भी नहीं हैं, क्योंकि जीव एक ही है । शुक आदिकी जो मुक्ति सुनी जाती है, वह भी स्वप्नकालिक अन्य पुरुषकी मुक्ति आदिके समान कल्पित ही है । तात्पर्य यह है
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