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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 15 of 590

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Page 15

[ १३ ]

है। उनका कहना है—यदि बाह्यार्थका सर्वथा अभाव माना जाय, तो 'बाहरके समान आन्तर वस्तुका अवभास होता है, यह योगाचारका कथन ही नहीं बन सकेगा, क्योंकि बाह्य पदार्थके सर्वथा अभावमें तन्निरूपित दृष्टान्तका न होना निश्चित ही है। इन्होंने रूपस्कन्ध, विज्ञानस्कन्ध, वेदनास्कन्ध, संज्ञास्कन्ध और संस्कारस्कन्ध, इस भेदसे पाँच स्कन्ध माने हैं। शब्दादि विषय और इन्द्रियाँ रूपस्कन्ध हैं, आलयविज्ञान और प्रवृत्तिविज्ञानका प्रवाह विज्ञानस्कन्ध है, सुखदुःखादिप्रत्ययका प्रवाह वेदनास्कन्ध है और संस्कारस्कन्धशब्दसे धर्माधर्मादि कहे जाते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् दुःखरूप और दुःखसाधन है, इस प्रकारकी भावना करके उसके निरोधके लिए तत्त्वज्ञानका सम्पादन करना चाहिए और वह तभी हो सकता है जब दुःख, आयतन, समुदाय और मार्ग रूप चार तत्त्वोंका * ठीक-ठीक परिज्ञान हो। एवञ्च इसीके परिज्ञानसे मोक्ष होता है। इन लोगोंकी सौत्रान्तिक इसलिए संज्ञा हुई कि इन्होंने सूत्रके परम रहस्यको पूछा है।

वैभाषिकमत

वैभाषिक लोग बाह्य अर्थको प्रत्यक्षसे ही सिद्ध करते हैं, अनुमानसे नहीं; क्योंकि व्याप्तिज्ञानके विना अनुमान हो ही नहीं सकता। अनुमानमें प्रत्यक्षात्मक ही व्याप्तिग्रह अपेक्षित होता है, यह सर्वानुभवसिद्ध है। इसलिए ग्राह्य और अध्यवसेय भेदसे दो प्रकारका अर्थ वैभाषिक लोगोंने माना है। पूर्वमतमें बाह्य अर्थकी सत्ता अनुमानसे ही मानी गई है और इस मतमें प्रत्यक्षसे मानी गई है, यह विशेष है। प्रत्यक्षप्रमाणसे गम्य अर्थ ग्राह्य है और अनुमानसे गम्य अर्थ अध्यवसेयरूप है, यह समझना चाहिए। यद्यपि आदि बुद्ध एक ही हैं, तथापि उन्होंने बाह्य और आन्तर पदार्थोंमें सर्वथा अनास्था रखनेवाले शिष्योंके प्रति उपदेशके लिए पहले शून्यवादका उपदेश दिया, विज्ञानमात्रमें आस्था रखनेवालोंके प्रति केवल विज्ञान ही सत् है, ऐसा उपदेश दिया और विज्ञान एवं बाह्य पदार्थोंमें श्रद्धा रखनेवालोंके प्रति दोनों सत्य हैं, ऐसा उपदेश दिया है, इसलिए विनेयभेदसे बुद्धकी भाषा भिन्न-भिन्न है—इस बातको यह चतुर्थ बुद्ध कहता है, अतः इसकी वैभाषिकसंज्ञा हुई।


* रूपादि पञ्चस्कन्ध दुःख है। पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच विषय, मन और बुद्धि दुःखका आयतन है। मनुष्योंके हृदयमें जो राग, द्वेषका उदय होता है, वही समुदायपदार्थ है और सब पदार्थ क्षणिक हैं, इस प्रकारकी स्थिर वासना-मार्गपदार्थ है, इन चार पदार्थोंके ज्ञानसे मोक्ष होता है।

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