सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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बौद्धमत
बौद्धमत चार प्रकारसे विभक्त है—माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिक। चार्वाकमतसे इनके मतमें अनेक विलक्षणताएँ हैं। ये लोग अनुमानको भी प्रमाण मानते हैं।
इन चारोंके मतमें 'सर्वं क्षणिकं क्षणिकम्, सर्वं दुःखं दुःखम्, सर्वं स्वलक्षणं स्वलक्षणम् और सर्वं शून्यं शून्यम्, इस प्रकारकी चतुर्विध भावनासे * परम पुरुषार्थ होता है, ऐसा माना गया है। इनका मत है कि शिष्योंको गुरुके पास जाकर योग और आचार दो क्रियाएँ करनी चाहिएँ। † योग—अप्राप्त वस्तुकी यथार्थरूपसे प्राप्तिके लिए शङ्का। आचार—गुरुने जो उत्तररूपसे कहा हो, उसका अङ्गीकार। गुरुजीने जो उपदेश दिया हो उसका अङ्गीकार कर पर्य्यनुयोग ( शङ्का ) नहीं करनेपर माध्यमिकसंज्ञा होती है। ये माध्यमिक सर्वशून्यवादी हैं और अनुमान प्रमाण मानते हैं।
योगाचारमत
माध्यमिक बौद्ध सर्वशून्यवादी हैं। और ये योगाचार बाह्यार्थशून्यवादी हैं अर्थात् आन्तरज्ञानरूप अर्थकी क्षणिकरूपसे स्थिति मानते हैं। इसमें युक्ति है कि यदि ज्ञानरूप अर्थ न माना जाय, तो जगदान्ध्यप्रसक्ति होगी, इसलिए बुद्धितत्त्व माननेकी आवश्यकता है। इनकी 'योगाचार' संज्ञा इसलिए हुई कि गुरु द्वारा कहे गए भावनाचतुष्टय और बाह्यार्थशून्यत्वका अङ्गीकार करनेके अनन्तर आन्तरज्ञानरूप अर्थकी शून्यता कैसे हो सकती है ? इस प्रकार पर्य्यनुयोग किया है। ये लोग क्षणिकत्वरूपसे बुद्धितत्त्वका अङ्गीकार करके बाह्यार्थवादका खण्डन करते हैं अर्थात् बाह्य पदार्थ ज्ञानरूप ही है, उसकी ज्ञानसे अतिरिक्त सत्ता नहीं मानते हैं। केवल वासनाविशेषसे ज्ञानमें अनेक आकार भासते हैं। पूर्वोक्त भावनाचतुष्टयसे सम्पूर्ण वासनाओंका उच्छेद हो जानेसे केवल विशुद्ध विज्ञानका उदय होना ही इनके मतमें मोक्षपदार्थ है।
सौत्रान्तिक मत
सौत्रान्तिकमतमें ज्ञानके सिवा बाह्यार्थ वस्तुकी सत्ता अनुमानसे मानी गई
* अर्थात् सब क्षणिक है, दुःखात्मक है, स्वलक्षण है और शून्य है, इस प्रकारकी भावनासे ही मोक्ष हो सकता है, यह बौद्धोंका कथन है।
† अप्राप्तार्थस्य प्राप्तये पर्य्यनुयोगो योगः। गुरूक्तस्यार्थस्याङ्गीकरणमाचारः, इस प्रकार योग और आचारका लक्षण मिलता है।