सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| १०६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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शास्त्रोपान्त्याधिकरणभाष्यादिषु कायव्यूहे प्रतिदेहमन्तःकरणस्य चक्षुरादिवत् भिन्नस्यैव योगप्रभावात् सृष्टेरुपवर्णनात् । प्रतिबिम्बे बिम्बात् भेदमात्रस्याऽध्यस्तत्वेन स्वरूपेण तस्य सत्यत्वान्न प्रतिबिम्बरूपजीवस्य मुक्त्यन्वयासम्भव
ब्रह्ममीमांसाशास्त्रके अन्तिम अधिकरणके पहले अधिकरणके भाष्य आदिमें कायव्यूहमें योगके प्रभावसे प्रत्येक शरीरमें चक्षु आदिके समान पृथक्-पृथक् अन्तःकरणकी उत्पत्तिका वर्णन किया गया है † । प्रतिबिम्बमें बिम्बसे जो भेद है * वही कल्पित है, इससे स्वरूपतः उसके सत्य होनेसे
भेद है और योगीका सब देहोंमें अभेद ही है इस प्रकार दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तमें वैषम्य है, तथापि दीपत्वजातिके अभेदका व्यक्तियोंमें आरोप करके दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिककी उपपत्ति करनी चाहिए । एक योगीकी अनेकताको श्रुति भी दिखलाती है—'स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा' ( वह योगी एक प्रकारका, तीन प्रकारका, पांच प्रकारका और सात प्रकारका अर्थात् अनेक प्रकारका हो सकता है )। एक ही समयमें अनेक शरीरोंमें योगीके अवस्थानके बिना अनेकत्व उपपन्न नहीं हो सकता ।
† यदि एक ही अन्तःकरणकी कार्यव्यूहमें अभिव्यक्तिके योग्य विपुलता मान ली जाय, तो उक्त भाष्यके साथ अवश्य विरोध होगा । यद्यपि भाष्य आदिका यह तात्पर्य कहना उचित है कि योगीका पूर्वसिद्ध अन्तःकरण ही—योगके प्रभावसे विपुलता प्राप्त कर स्वावच्छिन्न चैतन्यरूप योगीके कायव्यूहमें—भोग आदि कराता है । योगप्रभावसे अनेक अन्तःकरण उत्पन्न होते हैं, ऐसा तात्पर्य मानना ठीक नहीं है, क्योंकि अनेकविध अन्तःकरणोंकी सृष्टि माननेमें कल्पनागौरव और असत्कार्यवादका प्रसङ्ग आता है और हिरण्यगर्भ आदिका ब्रह्माण्डव्यापी जो समष्टि अन्तःकरण है, वह भी योगप्रभावसे ही है, भाष्यमें जो अन्तःकरणकी सृष्टिका प्रतिपादन है, वह परकीय मतके अभिप्रायसे है, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि 'एपैव च योगशास्त्रेषु' इत्यादि भाष्यमें यह अर्थ स्पष्ट है, तथापि शास्त्रोपान्त्याधिकरणके यथाश्रुत भाष्यके अभिप्रायसे यह दूषण दिया गया है, ऐसा समझना चाहिए ।
* इस ग्रन्थसे—चित्रदीपमें जो प्रतिबिम्ब चैतन्यरूप जीवके स्वरूपतः मिथ्या होनेसे त्रिकालावाधित ब्रह्मके साथ उस जीवकी एकता नहीं हो सकती, इसलिए चैतन्यके चार भेद करके ऐक्यनिर्वाहके लिए जीव और ईश्वरसे विलक्षण कूटस्थ चैतन्य माना गया है, और दृग्दृश्यविवेकमें प्रतिबिम्बको मिथ्या मानकर युक्तिसे अन्वयके लिए जो पारमार्थिक जीवकी कल्पनाकी गई है—उसका परिहार किया जाता है । अर्थात् प्रमाणके न होनेसे प्रतिबिम्ब जीवसे अतिरिक्त अन्य जीव—कूटस्थ या व्यावहारिक जीवसे अन्य प्रातिभासिक जीव नहीं है, यह भाव है, कुछ लोग शङ्का करते हैं कि व्यावहारिक जीव स्वप्नकालमें आवृत्त रहता है, अतः स्वप्नसमयके व्यवहारकी अनुपपत्ति ही प्रातिभासिक जीवकी कल्पना करती है । नहीं अनुपपत्ति