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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 135 of 590

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Page 135

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०५


स्याऽन्तःकरणरूपोऽज्ञानपरिणामभेदो विशेषाभिव्यक्तिस्थानं सर्वतः प्रसृतस्य सवितृप्रकाशस्य दर्पण इव। अतस्तस्य तदुपाधिकत्वव्यवहारोऽपि। नैतावताऽज्ञानोपाधिपरित्यागः, अन्तःकरणोपाधिपरिच्छिन्नस्यैव चैतन्यस्य जीवत्वे योगिनः कायव्यूहाधिष्ठानत्वानुपपत्तेः।

न च योगप्रभावाद्योगिनोऽन्तःकरणं कायव्यूहाभिव्यक्तियोग्यं वैपुल्यं प्राप्नोतीति तदवच्छिन्नस्य कायव्यूहाधिष्ठानत्वं युज्यते इति वाच्यम्, 'प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० १५) इति


अभिव्यक्तिस्थान दर्पण है, वैसे ही अज्ञानमें प्रतिबिम्बित जीवका विशेष अभिव्यक्ति-स्थान अज्ञानका परिणामरूप अन्तःकरण है। भाव यह है कि अविद्यामें प्रतिबिम्बित सुषुप्तिसाधारण चैतन्यरूपकी प्रमातृत्व, कर्तृत्व आदि विशेषरूपसे अभिव्यक्ति—उपलब्धिका स्थान (उपाधि) अन्तःकरण है। कर्तृत्व आदि धर्मोंके केवल अज्ञानके परिणाम न होनेसे उनकी उपाधिमात्रतासे जीवमें कर्तृत्व आदिका लाभ नहीं हो सकता, किन्तु कर्तृत्व आदि धर्मवाले अन्तःकरणके तादात्म्यके अध्याससे ही जीवमें कर्तृत्व आदिका लाभ हो सकता है, अतः अन्तःकरणमें जीवकी उपाधिकताका वर्णन किया गया है। अन्तःकरण विशेष उपलब्धिका स्थान है, ऐसा स्वीकार करनेसे जीवमें अन्तःकरणोपाधिकताका व्यवहार भी है, अर्थात् 'कार्योपाधिरयं जीवः' इत्यादि श्रुतिमें और भाष्यमें, यह रहस्य है। श्रुतिमें कार्योपाधिकताके विशेषणमात्रसे अज्ञानोपाधिकताके निराकरणका परित्याग नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणरूप उपाधिसे परिच्छिन्न चैतन्यको जीव माननेपर योगियोंमें एककालीन अनेक शरीरोंकी नियन्तृताकी उपपत्ति नहीं होगी।

योगके प्रभावसे योगीका अन्तःकरण कायव्यूहमें—देहसमूहमें—अभिव्यक्तिके योग्य व्यापकता प्राप्त करता है, अतः उस अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चिदात्मा भी कायव्यूहका प्रेरक हो सकता है ? ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' * इस शास्त्रोपान्त्याधिकरणके अर्थात्


* प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' इस सूत्रका अर्थ इस प्रकार है—जैसे एक ही प्रदीपका अनेक बत्तियोंमें प्रवेश है, वैसे ही एक ही योगीका योगके प्रभावसे अनेक शरीरोंमें आवेश—प्रवेश होता है। यद्यपि पूर्व दीपका और बत्तियोंमें प्रविष्ट अन्य दीपोंका परस्पर

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