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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 133 of 590

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Page 133

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०३


विवरणानुसारिणस्त्वाहुः—
‘विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते ।
आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति ॥’
इति स्मृत्यैकस्यैवाऽज्ञानस्य जीवेश्वरविभागोपाधित्वप्रतिपादनात् बिम्बप्रतिबिम्बभावेन जीवेश्वरयोर्विभागः, नोभयोरपि प्रतिबिम्बभावेन ।

विवरणके अनुयायी कहते हैं कि विभेदजनक अज्ञानका—जीव और ईश्वरके अवस्थानमें हेतुभूत अज्ञानका—आत्यन्तिक नाश * होनेपर जीवात्माका और परमात्माका (ब्रह्मका) असत्—अनिर्वचनीय भेद कौन करेगा अर्थात् कोई नहीं करेगा। इस प्रकारकी स्मृतिसे एक ही अज्ञान जीव और ईश्वरकी उपाधि कहा गया है, अतएव बिम्ब और प्रतिबिम्बरूपसे जीव और ईश्वरका विभाग है † । इन दोनोंका प्रतिबिम्बरूपसे विभाग नहीं है, क्योंकि दो


* आत्यन्तिकनाश—समूल अज्ञानका विनाश । यद्यपि अज्ञानका सुषुप्ति या प्रलयमें कार्य-कारणका अभेद होनेसे कार्यका नाश होनेसे कार्यात्मना अज्ञानका विनाश है, परन्तु वह आत्यन्तिक विनाश नहीं है, क्योंकि स्वरूपतः उसकी स्थिति है, अन्यथा पुनरुत्थानकी अनुपपत्ति होगी । तत्त्वज्ञानसे होनेवाला अज्ञाननाश स्वरूपसे ही होता है, अतः वह आत्यन्तिक विनाश है, इसी अभिप्रायसे अज्ञाननाशमें आत्यन्तिक विशेषण दिया गया है । अथवा जीवन्मुक्तिम आवरण अंशका नाश होनेपर भी अज्ञानके विक्षेपांशके रहनेसे आत्यन्तिक नाश नहीं है, परन्तु विदेहमुक्तिमें ही है, इसी अभिप्रायसे आत्यन्तिक विशेषण दिया गया है, यह भी कुछ लोग कहते हैं ।

† यहाँ शङ्का होती है कि ‘विभेदजनकेऽज्ञाने०’ इस श्रुतिके अनुसार ईशको बिम्ब और जीवको प्रतिबिम्ब माननेमें दोनोंको प्रतिबिम्ब माननेवाली ‘जीवेशावाभा०’ इस श्रुतिके साथ विरोध होगा । इसपर विवरणानुयायी कहते हैं कि प्रतिबिम्बत्वके समान बिम्बत्वके भी फलित होनेसे आभासशब्दसे बिम्ब और प्रतिबिम्ब दोनोंका ग्रहण हो सकता है, अतः विरोध नहीं है । यदि शङ्का की जाय कि प्रतिबिम्बत्वसे युक्त मुख आदिमें ही आभासशब्दका व्यवहार होता है, बिम्बत्वविशिष्ट मुखमें आभास-शब्दका व्यवहार नहीं होता, अतः आभासशब्दका मुख्य अर्थ बिम्ब नहीं हो सकता, इसलिए आभासशब्दकी बिम्बमें लक्षणा माननी पड़ेगी, तो यह शङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि एक बार उच्चरित आभासशब्दका मुख्यवृत्तिसे प्रतिबिम्ब अर्थ और गौणीवृत्तिसे बिम्ब अर्थ नहीं हो सकता । यदि कहिये कि अजहल्लक्षणा मानकर आभासशब्दके दोनों अर्थ मानेंगे, सो भी युक्त नहीं है, क्योंकि जब दोनोंको अर्थात् जीव और ईश्वरको प्रतिबिम्ब मानकर ही विभाग हो सकता है तब फिर, लक्षणाके झगड़ेमें पड़नेकी आवश्यकता ही क्या है ? इसपर विवरणानुसार उत्तर है कि श्रुतिके अनुसार भी जीव और ईश्वरका विभाग केवल प्रतिबिम्बरूपसे नहीं हो सकता, सूर्यके समान