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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 108 of 590

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Page 108

७८ सिद्धान्तलेशसंग्रहं [ प्रथम परिच्छेदे


मृद इव तद्गतश्लक्ष्णत्वादेरपि घटे अनुगमनदर्शनादित्याहुः ।

ब्रह्मैव जीवाश्रितयाऽविद्यया विषयीकृतम् ।
वाचस्पतिमते हेतुर्माया तु सहकारिणी ॥ २६ ॥

वाचस्पतिमिश्रके मतमें जीवाश्रित अविद्यासे विषयीकृत ब्रह्म ही जगत्के प्रति उपादान है और माया तो सहकारी कारण है ॥ २६ ॥


विरोध होगा, कारण कि उन श्रुतियों द्वारा ब्रह्ममें नित्यत्व, अविकारित्व आदिका प्रतिपादन किया गया है। अतः मायाके द्वारा ही ब्रह्म कारण है, ऐसा कहना चाहिए, अतः माया व्यर्थ भी नहीं है। जैसे घटादिके प्रति मृद् आदिके उपादान होनेपर भी मृत्तिकामें रहनेवाला श्लक्ष्णत्व आदि संस्कार द्वारकारण हैं, क्योंकि जब तक मृत्तिकाका संस्कार न किया जाय, तब तक मृत्तिकामें घटादिकी उपादानता नहीं घट सकती है, वैसे ही कूटस्थ चैतन्यरूप ब्रह्ममें आरोपित माया उसमें (ब्रह्ममें) जगत्प्रकृतित्वका सम्पादन करके सहकारिकारण बन जाती है। मायामें उपादानत्वकी प्रतिपादिका 'मायांन्तु प्रकृतिं विद्यात्' इत्यादि श्रुतिके साथ विरोध भी नहीं है, क्योंकि उन श्रुतियोंका तात्पर्य यह है कि माया ही ब्रह्ममें प्रकृतित्वका निर्वाह करती है, अतः उसमें प्रकृतित्वका केवल उपचार है। इसीलिए मायामें शक्तित्वका व्यवहार होता है—'पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते' (इस ब्रह्मकी अनेक परा शक्तियाँ हैं) और मृत्तिकामें रहनेवाली शक्तिमें घटादिके प्रति उपादानता लोकमें नहीं देखी जाती है। अतः माया और ब्रह्म दोनोंमें उपादानता नहीं है। इस मतमें परिणामी उपादान कोई नहीं, होगा यदि ब्रह्ममें वैसी उपादानता मानी जाय, तो सैकड़ों श्रुतियोंके साथ विरोध होगा, इसलिए वाचस्पतिमतके समान चित्में अध्यस्तमाया-विषयीकृत ब्रह्मका प्रपञ्च विवर्त है, यही इस मतमें मानना होगा, संक्षेप-शारीरकमें कहींपर मायामें परिणामित्वका कथन किया गया है, वह अन्य मतोंके अभिप्रायसे किया गया है, यह ध्यानमें रखना चाहिए]। अकारण भी द्वार-कार्यमें अनुस्यूत होता है। जैसे कि मृत्तिकाके समान मृत्तिकामें रहनेवाले श्लक्ष्णत्व आदिका भी घटमें अनुगम होता है, यह देखा जाता है। अतः मायाकी जड़ताका घटादिमें भान होता है।

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