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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 107 of 590

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Page 107

मायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७७


ब्रह्ममात्रमुपादानं माया तु द्वारकारणम् ।
मृच्छ्लक्ष्णतावत् संक्षेपशारीरककृतां नये ॥ २५ ॥

संक्षेपशारीरककारके मतमें केवल ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान है और माया तो जैसे घट आदिके प्रति मृत्तिकाका श्लक्ष्णत्व द्वार कारण है, वैसे ही द्वार कारण है ॥ २५ ॥

**सङ्क्षेपशारीरककृतस्तु—**ब्रह्मैवोपादानम् । कूटस्थस्य स्वतः कारणत्वानुपपत्तेः माया द्वारकारणम् । अकारणमपि द्वारं कार्येऽनुगच्छति ।

ब्रह्म ही जगत्का उपादान कारण है, माया उपादान कारण नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरककार कहते हैं, कूटस्थ ब्रह्ममें स्वतः कारणताकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः माया द्वार कारण है । [ भाव यह है कि यदि मायाके बिना ही ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान कारण हो, तो माया व्यर्थ होगी और ब्रह्म स्वयं परिणामी होगा, इस परिस्थितिमें परिणामवादियोंके मतमें परिणाम और परिणामीका परस्पर वस्तुसत् अभेद होनेसे परिणामके जन्म आदि विकारोंसे ब्रह्म भी विकृत होगा, और इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं, क्योंकि 'न जायते' ( आत्मा उत्पन्न नहीं होता ) इस प्रकार अनेक श्रुतियोंके साथ


* संक्षेपशारीरककार कूटस्थ ब्रह्मको जगत्के प्रति उपादान मानते हैं, इसके सविशेष दृढ़ीकरणमें उन्हींके दो श्लोक देते हैं—

उपादनता चेतनस्याऽपि दृष्टा यथा स्वप्नसर्गे विचित्रे प्रतीचः ।
यथा चोर्णनाभस्य सूत्रेषु पुंसां यथा केशलोमादिसृष्टौ च दृष्टा ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५४५ ]

अज्ञानतज्जघटना चिदधिक्रियायाम् द्वारं परं भवति नाधिकृतत्वमस्याः ।
नाचेतनस्य घटतेऽधिकृतिः कदाचित् कर्तृत्वशक्तिविरहादिति वक्ष्यते हि ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५५५ ]

**अर्थात्—**जैसे विचित्र स्वप्नसृष्टिमें निद्रासे तिरस्कृत—अभिभूत है करणसमुदाय जिसका ऐसा प्रत्यगात्मा उपादान है, और जैसे ऊर्णनाभ उसके सूत्रोंके प्रति उपादान है अथवा जैसे केश, लोम आदिमें पुरुष उपादान है, वैसे ही कूटस्थ चेतन भी उपादान है । अविद्या और उसके कार्यका अध्यास ब्रह्मकी अधिकारितामें अर्थात् जगत्के प्रति ब्रह्ममें उपादानत्वके सम्पादनमें निमित्तमात्र है, क्योंकि अचेतनकी अध्यासमें अधिकारिता नहीं है, कारण कि उसमें कर्तृत्वशक्तिका अभाव है, ऐसा कहेंगे । और ५५३ के 'अनधिकारिणि शुद्धचिदात्मके' इत्यादिमें भी 'माया ब्रह्मकी अधिकारिताकी सम्पादिका है' ऐसा कहा गया है । इससे स्पष्ट रीतिसे ज्ञात होता है कि संक्षेपशारीरककारने मूलोक्त विषयका अत्यन्त विस्तारसे अपने ग्रन्थमें विवेचन किया है ।


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