सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९ )
जैसे— १९५ ) २२१ ( १
१९५
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२६ ) १९५ ( ७
१८२
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१३ ) २६ ( २
२६
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×
यहाँ पर भाज्य और हार का अपवर्तनांक १३ है। जो क्षेपक ६५ का भी अपवर्तन
होता है। अतः लाघव से भाज्य = २२१/१३ = १७,
हार = १९५/१३ = १५ और क्षेपक ६५ ÷ १३ = ५ । अतः भाज्य भाजक में परस्पर
भाग देने से पूर्व की लब्धियों को अधोऽधः रखने से (तब तक भाग देते रहें जब तक
शेष १ हो) एक बल्ली लता सी बनती है। जैसे, १७ ÷ १५ = ल० १ शेष २ से १५ में
भाग देने से = ल० ७ शेष १ हो जाने से बल्ली भी यहीं समाप्त हो जाने से बल्ली के
दो अंक होते हैं। बल्ली के नीचे क्षेपक = ५ और अंत में ० शून्य रखने से बल्ली का
स्वरूप = १ / ७ / ५ / ० (अधोऽधः) होता है। अन्तिम अंक = ०, अन्तिम के समीप का ऊपरी अंक = ५ तदुपरि
अंक = ७, ५ × ७ = ३५ + ० = ३५, तब बल्ली का स्वरूप = १ / ३५ / ५ पूर्ववत् ३५ ×
१ + ५ = ४० और ३५ बल्ली का लघु स्वरूप ४० / ३५ हो जाता है। इनमें दृढ़
भाज्य १७ दृढ़ हार १५ से शोधित करने पर ४० ÷ १७ = ६, ३५ ÷
१५ शेष ५ अन्तिम बल्ली का फल = ६ / ५ इन दोनों में गुणकांक = ५ और लब्धाङ्क =
६ उत्तर हो जाते हैं। आलाप से (२२१ × ५ + ६५) / १९५ = ल० ६ । इस उत्तर के अतिरिक्त
१, २, ३ इष्ट कल्पनावश भा० १७ क्षे० ५, हा० १५, ६ लब्धि, ल० २३, ४०, ५७ गुणांक
गु० २०, ३५, ५० इत्यादि। अनेक सही उत्तर होते हैं। जैसे, (२२१ × २० + ६५) / १९५ = २३ लब्धि
इत्यादि, अनेक सही उत्तर हो जाते हैं। जैसे, (२२१ × ३५ + ६५) / १९५ = ४० लब्धि। इस
कुट्टक गणित का ग्रह गणित में अत्यधिक उपयोग हुआ है। संक्षेप में सृष्ट्यादि से वर्त-
मान शक वर्ष के किसी भी अभीष्ट दिन के अहर्गण ज्ञान से कल्प कुदिन में कल्प के ग्रह
भगण तो इष्ट अहर्गण में ग्रह की राश्यादि क्या होगी ? जैसे, (क० ग्र० भ० × इ० अहर्गण) / (क० कु० दि०)