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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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का मान हो जाता है । और चतुर्भुज की शेष दोनों भुजाएँ त्रिभुज की भुजाएँ बन
जाती हैं । दूसरा संकुचित कर्ण चतुर्भुज के लम्ब से कम नहीं होगा और वे दोनों भुजाएँ
आधार से बड़ी नहीं होगी । इस कथन के अनुसार ५६ की जगह पर कर्ण के ३२ मानने
से इसी चतुर्भुज का दूसरा कर्ण ७६ २२/२५ आता है । (सामने चित्र देखिये)
(२) इसी क्षेत्र को समलम्ब चतु-
भुज की स्थिति में रखने से ६० - २५ =
३५ को आधार मानकर, अन्तर्लम्ब
त्रिभुज के स्वरूप में ३५ आधार के दो
विभागों में एक विभाग का मान ३/५ और
दूसरे विभाग का मान १७२/५ होता है ।
तथा शीर्षकोण से आधार तक लम्ब का
मान √(३८०१६ / २५) आता है ।
आसन्नमूल लेने से लम्ब का मान ३८ २४/२५ आता है । √{(६० - ३/५)² + ३८०१६/२५}
आसन्न मूल ७१ १/१८ तथा √{(६० - १७२/५)² + ३८०१६/२५} आसन्न मूल ४६ २/३
यह द्वितीय कर्ण होता है ।