सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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भास्कराचार्य की अंकगणित की कुछ प्रतिभाएँ
भास्कराचार्य ने लीलावती ग्रन्थ के क्षेत्र व्यवहार में चतुर्भुज क्षेत्र के क्षेत्रफल निका-
लने के सम्बन्ध में अपनी सूक्ष्म बुद्धि का परिचय दिया है । एक चतुर्भुज क्षेत्र है ।
जिसकी दोनों भुजाएँ क्रमशः ५२ और ३९ हैं । जिसकी भूमि आधार ६० के तुल्य है,
तथा जिसका मुख २५ हाथ के तुल्य है । प्राचीनों ने इस क्षेत्र को अतुल्य लम्बक कहते
हुये इसके दोनों कर्णों को क्रमशः ५६ और ६३ के तुल्य ही कहा है ।
भास्कराचार्य ने प्राचीनों के इस गणित को एक देशीय गणित कहा है । “ब्रह्म-
गुप्ताचार्य” के मत को आगम मानते हुये भी आचार्य ने सिद्धान्त पक्ष स्थापित करने में
सङ्कोच नहीं किया है । ब्रह्मगुप्त का निःसंकोच खण्डन भी किया है ।
भास्कराचार्य का कथन है कि—चतुर्भुज की चारों भुजाओं के मान नियत होने पर
भी उसके नियत कर्ण नहीं हो सकते । कर्णों की नियत स्थिति न होने से लम्ब मानों में भी
अन्तर पड़ता है, जिससे चतुर्भुज का क्षेत्रफल एक रूप का कदापि न होकर अवश्य
अनेक रूप का हो सकता है ।
जैसे, उक्त अ क ल प चतुर्भुज के अ क और ल क अथवा क कोण की दोनों भुजाओं
को भीतर की तरफ संकुचित करने से क ल और क अ भुजाओं के योग ७७ के तुल्य
तक कर्ण का परम मान होगा जो ब्रह्मगुप्त के मत से बृहत्कर्ण ६३ के तुल्य मानने पर
लघुकर्ण का मान केवल ५६ ही आता है ठीक है, किन्तु भास्कराचार्य का कथन है कि—
(१) चतुर्भुज के एकान्तर कोणों के खिंचाव से चतुर्भुज संकुचित होकर त्रिभुज के रूप
में परिणत हो जाता है । जैसे एक कोण में लगी हुई दो भुजाओं के योग के तुल्य आधार